kamyab nuskhe

अनुभूत टोटके


प्रकृति के अनुसार कोई व्यक्ति जब अपने ही कर्मों के अनुसार दुख उठाता है और जब वह अपने किये की सजा पा लेता है तो मनुष्य ही उस व्यक्ति के दुखों को दूर करने का उपाय करता है। भौतिक कारणों के अनुसार व्यक्ति को बीमारी का इलाज करवाने के लिये अस्पताल में जाना पडता है,अगर व्यक्ति को दुख और उठाना है तो अस्पताल का डाक्टर नही मिलता है,मिलता भी है तो बीमारी को किसी तरह से नही पहिचान पाता है और बुखार की जगह पर अन्य किसी रोग की दवा करने लगता है,परिणाम में वह व्यक्ति जो दुख झेल रहा था,अन्य प्रकार की दवा खाने और उसके रियेक्सन करने के कारण नया दुख झेलने लगता है,तो वजाय दुख दूर होने और दुख मिलने लगते है। पुराने जमाने में कोई बडे डाक्टर अस्पताल नही थे,पुरुखों के पास केवल अनुभूत उपाय थे,जिनके द्वारा वे रोग को तुरत दूर कर देते थे,जैसे किसी सुनसान स्थान या पेड के पास जाने पर वहां पर लगी बर्र या ततैया के झुंड के द्वारा आक्रमण करने पर व्यक्ति सहन शील होता है और विष को झेलने की हिम्मत होती है तो वह बच जाता है,अन्यथा जहरीला डंक व्यक्ति के प्राण ही लेलेता है,लेकिन इसी समय एक टोटका काम आता है,कि दाहिने हाथ के अंगूठे में अगर ततैया ने डंक मार दिया है तो फ़ौरन बायें हाथ के अंगूठे को पानी से धो डालिये,विष का पता ही नही चलेगा कि ततैया या बर्र ने काटा भी है या नहीं,इसी बात के लिये जब तक डाक्टर के पास जाते,बर्र या ततैया के डंक को निकलवाते विष रोधी इन्जेक्सन लगवाते,तो विष का दुख तो दूर हो जाता,लेकिन उस इन्जेक्सन का कुप्रभाव दिमाग की नशों को प्रभाव हीन भी कर सकता था।

जहरीले जानवर के काटने का टोटका

अधिकतर जाने अन्जाने में जहरीला जानवर जैसे बर्र ततैया बिच्छू मधुमक्खी आदि अपना डंक मार देते है,दर्द के मारे छटपटाहट होने लगती है,और उस समय कोई दवा नही मिलपाती है तो और भी हालत खराब हो जाती है,इसका एक अनुभूत टोटका है कि जिस स्थान पर काटा है,उसके उल्टे स्थान को पानी धो डालिये जहर खत्म हो जायेगा,जैसे दाहिने हाथ की उंगली में डंक मारा है,तो बायें हाथ की उसी उंगली को पानी से धो डालिये,बायें हिस्से में डंक मारा है तो उसी स्थान को दाहिने भाग में पानी से धो डालिये।

पढाई में याददास्त बढाने का टोटका

याददास्त कोई हौवा नही है,कि याद होता नही है,और याद होता नही है तो पढाई बेकार हो जाती है,परीक्षा में परिणाम नकारात्मक आता है,और दिमाग का एक कौना मानने लगता है कि यह पढाई बेकार है,इसे छोड कर कोई जीवन यापन का काम कर लेना चाहिये,और इस बेकार के झमेले को छोड देना चाहिये,लेकिन नही अगर वास्तव मे आपको पढने का चाव है और आप चाहते है कि आपका परिणाम भी उन्ही लोगों की तरह से आये जैसे कि ब्रिलियेंन्ट बच्चों का आता है,तो इस टोटके को अंजवा लीजिये।

शाम को खाना खा कर बायीं करवट ढाई घंटे के लिये लेट जाइये,फ़िर ढाई घंटे दाहिनी करवट लेट जाइये,और ढाई घंटे उठकर सीधे बैठ कर पढना चालू कर दीजिये,यह क्रम लगातार चालू रखिये,देखिये कि जो टापिक कभी याद नही होते थे,इतनी अच्छी तरह से याद हो जायेंगे कि खुद को विश्वास ही नहीं होगा।

अमीर बनने का अनुभूत टोटका

जो भी कमाया जाये उसका दसवां हिस्सा गरीबों को भोजन,कन्याओं को भोजन और वस्त्र,कन्यायों की शादी,धर्म स्थानों को बनाने के काम,आदि में खर्च करिये,देखिये कि आपकी आमदनी कितनी जल्दी बढनी शुरु हो जाती है। लेकिन दसवें हिस्से अधिक खर्च करने पर बजाय आमदनी बढने के घटने लगेगी।

शादी करने का अनुभूत उपाय

पुरुषों को विभिन्न रंगों से स्त्रियों की तस्वीरें और महिलाओं को लाल रंग से पुरुषों की तस्वीर सफ़ेद कागज पर रोजाना तीन महिने तक एक एक बनानी चाहिये।

ट्रांसफ़र करवाने का उपाय

कार्य स्थान पर जाने के बाद पैर धोकर अपने स्थान पर बैठना चाहिये,पिसी हल्दी को बहते पानी में बहाना चाहिये।

घर की कलह को समाप्त करने का उपाय

रोजाना सुबह जागकर अपने स्वर को देखना चाहिये,नाक के बायें स्वर से जागने पर फ़ौरन बिस्तर छोड कर अपने काम में लग जाना चाहिये,अगर नाक से दाहिना स्वर चल रहा है तो दाहिनी तरफ़ बगल के नीचे तकिया लगाकर दुबारा से सो जाना चाहिये,कुछ समय में बायां स्वर चलने लगेगा,सही तरीके से चलने पर बिस्तर छोड देना चाहिये।

संतान होने और नही होने की पहिचान करना

पुरुष और स्त्री के दाहिने हाथ मे साफ़ मिट्टी रख कर उसके अन्दर थोडा दही और पिसी शुद्ध हल्दी रखनी चाहिये,यह काम रात को सोने से पहले करना चाहिये,सुबह अगर दोनो के हाथ में हल्दी का रंग लाल हो गया है तो संतान आने का समय है,स्त्री के हाथ में लाल है और पुरुष के हाथ में पीली है तो स्त्री के अन्दर कामवासना अधिक है,पुरुष के हाथ में लाल हो गयी है और स्त्री के हाथ में नही तो स्त्री रति सम्बन्धी कारणों से ठंडी है,और संतान पैदा करने में असमर्थ है,कुछ समय के लिये रति क्रिया को बंद कर देना चाहिये।

दिमाग से चिन्ता हटाने का टोटका

अधिकतर पारिवारिक कारणों से दिमाग बहुत ही उत्तेजना में आजाता है,परिवार की किसी समस्या से या लेन देन से,अथवा किसी रिस्तेनाते को लेकर दिमाग एक दम उद्वेलित होने लगता है,ऐसा लगने लगता है कि दिमाग फ़ट पडेगा,इसका एक अनुभूत टोटका है कि जैसे ही टेंसन हो एक लोटे में या जग में पानी लेकर उसके अन्दर चार लालमिर्च के बीज डालकर अपने ऊपर सात बार उबारा (उसारा) करने के बाद घर के बाहर सडक पर फ़ेंक दीजिये,फ़ौरन आराम मिल जायेगा।

खाना पचाने का टोटका

अधिकतर बैठे रहने से या खाना खाने के बाद मेहनत नही करने से भोजन पच नही पाता है और पेट में दर्द या पेट फ़ूलने लगता है,खाना खाने के बाद तुरंत बायीं करवट लेट जाइये,खाना आधा घन्टे में अपनी जगह बनाकर पचने लगेगा और अपान वायु बाहर निकल जायेगी।

शादी विवाह में विघ्न न पडने देने के लिये टोटका

शादी वाले दिन से एक दिन पहले एक ईंट के ऊपर कोयले से "बाधायें" लिखकर ईंट को उल्टा करके किसी सुरक्षित स्थान पर रख दीजिये,और शादी के बाद उस ईंट को उठाकर किसी पानी वाले स्थान पर डाल कर ऊपर से कुछ खाने का सामान डाल दीजिये,शादी विवाह के समय में बाधायें नहीं आयेंगी।

घर से पराशक्तियों को हटाने का टोटका

एक कांच के गिलास में पानी में नमक मिलाकर घर के नैऋत्य के कोने में रख दीजिये,और उस बल्ब के पीछे लाल रंग का एक बल्व लगा दीजिये,जब भी पानी सूख जाये तो उस गिलास को फ़िर से साफ़ करने के बाद नमक मिलाकर पानी भर दीजिये।

घर मे धन की बरक्कत के लिये टोटका

सबसे छोटे चलने वाले नोट का एक त्रिकोण पिरामिड बनाकर घर के धन स्थान में रख दीजिये,जब धन की कमी होने लगे तो उस पिरामिड को बायें हाथ में रखकर दाहिने हाथ से उसे ढककर कल्पना कीजिये कि यह पिरामिड घर में धन ला रहा है,कहीं से भी धन का बन्दोबस्त हो जायेगा,लेकिन यह प्रयोग बहुत ही जरूरत में कीजिये।

ईश्वर का दर्शन करने के लिये टोटका

शाम को एकान्त कमरे में जमीन पर उत्तर की तरफ़ मुंह करके पालथी मारकर बैठ जाइये,दोनों आंखों को बन्द करने के बाद आंखों की द्रिष्टि को नाक के ऊपर वाले हिस्से में ले जाने की कोशिश करिये,धीरे धीरे रोजाना दस से बीस मिनट का प्रयोग करिये,लेकिन इस काम को करने के बीच में किसी भी प्रकार के विचार दिमाग में नही लाने चाहिये,आपको आपके इष्ट का दर्शन सुगमता से हो जायेगा।



कुन्डली विवेचन के सौ तरीके

१. निर्णय करने के लिये शास्त्र की सहायता लेनी चाहिये,और संकेतों के माध्यम से जातक का फ़लकथन कहना चाहिये,ध्यान रखना चाहिये कि नाम और धन आने के बाद आलस का आना स्वाभाविक है,इस बात को ध्यान रखकर किसी भी जातक की उपेक्षा नही करना चाहिये,सरस्वती किसी भी रूप में आकर परीक्षा ले सकती है,और परीक्षा में खरा नही उतरने पर वह किसी भी प्रकार से लांक्षित करने के बाद समाज और दुनिया से वहिष्कार कर सकती है,जिसके ऊपर सरस्वती महरवान होगी वह ही किसी के प्रति अपनी पिछली और आगे की कहानी का कथन कर पायेगा।

२.जब प्रश्न करने वाला अनायास घटना का वर्णन करता है तो उसे उस घटना तथा उसके अपने अनुमान में कोई अन्तर नही मिलेगा,दूसरे शब्दों में अगर समय कुन्डली या जन्म कुन्डली सही है तो वह गोचर के ग्रहों के द्वारा घटना का वर्णन अपने करने लगेगी।

३.जिस किसी घटना या समस्या का विचार प्रच्छक के मन में होता है,वह समय कुन्डली बता देती है,और जन्म कुन्डली में गोचर का ग्रह उसके मन में किस समस्या का प्रभाव दे रहा है,वह समस्या कब तक उसके जीवन काल में बनी रहेगी,यह सब समस्या देने वाले ग्रह के अनुसार और चन्द्रमा के अनुसार कथन करने से आसानी रहेगी।

४.प्रच्छक की तर्क ही ज्योतिषी के लिये किसी शास्त्र को जानने वाले से अधिक है,उसकी हर तर्क ज्योतिषी को पक्का भविष्य वक्ता बना देती है,जो जितना तर्क का जबाब देना जानता है,वही सफ़ल ज्योतिषियों की श्रेणी में गिना जाता है।

५.कुशल ज्योतिषी अपने को सामने आने वाली समस्याओं से बचाकर चलता है,उसे शब्दों का ज्ञान होना अति आवश्यक है,किसी की मृत्यु का बखान करते वक्त "मर जाओगे",की जगह "संभल कर चलना" कहना उत्तम है।

६.कुन्डली के अनुसार किसी शुभ समय में किसी कार्य को करने का दिन तथा घंटा निश्चित करो,अशुभ समय में आपकी विवेक शक्ति ठीक से काम नही करेगी,चाहे आंखों से देखने के बाद आपने कोई काम ठीक ही क्यों न किया हो,लेकिन किसी प्रकार की विवेक शक्ति की कमी से वह काम अधूरा ही माना जायेगा।

७.ग्रहों के मिश्रित प्रभावों को समझने की बहुत आवश्यक्ता होती है,और जब तक आपने ग्रहों ,भावों और राशियों का पूरा ज्ञान प्राप्त नही किया है,आपको समझना कठिन होगा,जो मंगल चौथे भाव में मीठा पानी है,वही मंगल आठवें भाव में शनि की तरह से कठोर और जली हुई मिट्टी की तरह से गुड का रूप होता है,बारहवें भाव में जाते जाते वह मीठा जली हुयी शक्कर का हवा से भरा बतासा बन जाता है।

८.सफ़ल भविष्य-वक्ता किसी भी प्रभाव को विस्तार से बखान करता है,समस्या के आने के वक्त से लेकर समस्या के गुजरने के वक्त के साथ समस्या के समाप्त होने पर मिलने वाले फ़ल का सही ज्ञान बताना ही विस्तार युक्त विवेचन कहा जाता है।

९.कोई भी तंत्र यंत्र मंत्र ग्रहों के भ्रमण के अनुसार कार्य करते है,और उन्ही ग्रहों के समय के अन्दर ही उनका प्रयोग किया जाता है,यंत्र निर्माण में ग्रहों का बल लेना बहुत आवश्यक होता है,ग्रहो को बली बनाने के लिये मंत्र का जाप करना आवश्यक होता है,और तंत्र के लिये ग्रहण और अमावस्या का बहुत ख्याल रखना पडता है। कहावत भी है,कि मंदिर में भोग,अस्पताल में रोग और ज्योतिष में योग के जाने बिना केवल असत्य का भाषण ही है।

१०.किसी के प्रति काम के लिये समय का चुनाव करते वक्त सही समय के लिये जरा सा बुरा समय भी जरूरी है,जिस प्रकार से डाक्टर दवाई में जहर का प्रयोग किये बिना किसी रोग को समाप्त नही कर सकता है,शरीर में गुस्सा की मात्रा नही होने पर हर कोई थप्पड मार कर जा सकता है,घर के निर्माण के समय हथियार रखने के लिये जगह नही बनाने पर कोई भी घर को लूट सकता है।

११.किसी भी समय का चुनाव तब तक नही हो सकता है,जब तक कि " करना क्या है" का उद्देश्य सामने न हो।

१२.बैर प्रीति और व्यवहार में ज्योतिष करना बेकार हो जाता है,नफ़रत मन में होने पर सत्य के ऊपर पर्दा पड जाता है,और जो कहा जाना चाहिये वह नही कहना,नफ़रत की निशानी मानी जाती है,बैर के समय में सामने वाले के प्रति भी यही हाल होता है,और प्रेम के वक्त मानसिक डर जो कहना है,उसे नही कहने देता है,और व्यवहार के वक्त कम या अधिक लेने देने के प्रति सत्य से दूर कर देता है।

१३.ग्रह कथन के अन्दर उपग्रह और छाया ग्रहों का विचार भी जरूरी है,बेकार समझ कर उन्हे छोडना कभी कभी भयंकर भूल मानी जाती है,और जो कहना था या जिस किसी के प्रति सचेत करना था,वह अक्सर इन्ही कारणो से छूट जाता है,और प्रच्छक के लिये वही परेशानी का कारण बन जाता है,बताने वाला झूठा हो जाता है।

१४.जब भी सप्तम भाव और सप्तम का मालिक ग्रह किसी प्रकार से पीडित है,तो कितना ही बडा ज्योतिषी क्यों न हो,वह कुछ न कुछ तो भूल कर ही देता है,इसलिये भविष्यकथन के समय इनका ख्याल भी रखना जरूरी है।

१५.तीसरे छठे नवें और बारहवें भाव को आपोक्लिम कहा जाता है,यहां पर विराजमान ग्रह राज्य के शत्रु होते है,केन्द्र और पणफ़र लग्न के मित्र होते है,यह नियम सब जगह लागू होता है।

१६.शुभ ग्रह जब आठवें भाव में होते है,तो वे अच्छे लोगों द्वारा पीडा देने की कहानी कहते है,लेकिन वे भी शुभ ग्रहों के द्वारा देखे जाने पर पीडा में कमी करते हैं।

१७.बुजुर्ग व्यक्तियों के आगे के जीवन की कहानी कहने से पहले उनके पीछे की जानकारी आवश्यक है,अगर कोई बुजुर्ग किसी प्रकार से अपने ग्रहों की पीडा को शमन करने के उपाय कर चुका है,तो उसे ग्रह कदापि पीडा नहीं पहुंचायेगा,और बिना सोचे कथन करना भी असत्य माना जायेगा।

१८.लगन में सूर्य चन्द्र और शुभ ग्रह एक ही अंश राशि कला में विद्यमान हों,या सूर्य चन्द्र आमने सामने होकर अपनी उपस्थित दे रहे हों तो जातक भाग्यशाली होता है,लेकिन पापग्रह अगर उदित अवस्था में है तो उल्टा माना जायेगा।

१९.गुरु और चन्द्र अगर अपनी युति दे रहे है,चाहे वह राशि में हो,या नवांश में हो,कोई भी पुरानी बात सामने नही आ सकती है,जिस प्रकार से इस युति के समय में दी गयी दस्त कराने की दवा असर नही करती है।

२०.चन्द्र राशि के शरीर भाग में लोहे के शस्त्र का प्रहार खतरनाक हो जाता है,जैसे कोई भी किसी स्थान पर बैठ कर अपने दांतों को कील से खोदना चालू कर देता है,और उसी समय चन्द्रमा की उपस्थिति उसी भाग में है तो या तो दांत खोदने की जगह विषाक्त कण रह जाने से भयंकर रोग हो जायेगा,और मुंह तक को गला सकता है,और डाक्टर अगर इंजेक्सन चन्द्र के स्थान पर लगा रहा है,तो वह इंजेक्सन या तो पक जायेगा,या फ़िर इंजेक्सन की दवा रियेक्सन कर जायेगी।

२१.जब चन्द्रमा मीन राशि में हो,और लगनेश की द्रिष्टि पहले भाव से चौथे भाव और सातवें भाव में उपस्थिति ग्रहों पर हो तो इलाज के लिये प्रयोग की जाने वाली दवा काम कर जायेगी,और अगर लगनेश का प्रभाव सातवें भाव से दसवें भाव और दसवें भाव से पहले भाव तक के ग्रहों पर पड रही है तो वह दवा उल्टी के द्वारा बाहर गिर जायेगी,या फ़ैल जायेगी।

२२.सिंह राशि के चन्द्रमा में कभी भी नया कपडा नही पहिनना चाहिये,और न ही पहिना जाने वाला उतार कर हमेशा के लिये दूर करना चाहिये,और यह तब और अधिक ध्यान करने वाली बात होती है जब चन्द्रमा किसी शत्रु ग्रह द्वारा पीडित हो रहा हो,कारण वह वस्त्र पहिनने वाला या तो मुशीबतों के अन्दर आ जायेगा,या वह कपडा ही बरबाद हो जायेगा।

२३.चन्द्रमा की अन्य ग्रहों पर नजर मनुष्य के जीवन में अकुलाहट पैदा कर देती है,शक्तिशाली नजर फ़ल देती है,और कमजोर नजर केवल ख्याल तक ही सीमित रह जाती है।

२४.चन्द्रमा के जन्म कुन्डली में केन्द्र में होने पर अगर कोई ग्रहण पडता है,तो वह खतरनाक होता है,और उसका फ़ल लगन और ग्रहण स्थान के बीच की दूरी के अनुसार होता है,जैसे सूर्य ग्रहण में एक घंटा एक साल बताता है,और चन्द्र ग्रहण एक घंटा को एक मास के लिये बताता है। उदाहरण के लिये मान लीजिये कि ग्रहण के समय चन्द्रमा चौथे भाव पहले अंश पर है,और लगन से चौथा भाव लगन में आने का वक्त सवा दो घंटे के अनुसार लगन बदलने का पौने सात घंटे का समय लगता है,तो प्रभाव भी चन्द्र ग्रहण के अनुसार पोने सात महिने के बाद ही मिलेगा,और सूर्य ग्रहण से पोने सात साल का समय लगेगा।

२५.दसवें भाव के कारक ग्रह की गति भूमध्य रेखा से नापी जाती है,और लगन के कारक ग्रह की गति अक्षांश के अनुसार नापना सही होता है। जैसे एक जातक का पिता अपने घर से कहीं चला गया है,तो उसका पता करने के लिये भूमध्य रेखा से पिता के कारक ग्रह की दूरी नापने पर पिता की स्थिति मिल जायेगी,एक अंश का मान आठ किलोमीटर माना जाता है,और लगनेश की दूरी के लिये अक्षांश का हिसाब लगना पडेगा।

२६.यदि किसी विषय का कारक सूर्य से अस्त हो,चाहे कुन्डली के अस्त भाग १,४,७, में या अपने से विपरीत स्थान में हो तो कुछ बात छिपी हुई है,परन्तु बात खुल जायेगी यदि कारक उदित हो या उदित भाग में हो।

२७.जिस राशि में शुक्र बैठा हो उसके अनुरूप शरीर के भाग में शुक्र द्वारा सुख मिलता है,ऐसा ही दूसरे ग्रहों के साथ भी होता है।

२८.यदि चन्द्रमा का स्वभाव किसी से नही मिलता है,तो नक्षत्र के देखना चाहिए।

२९.नक्षत्र पहले सूचित किये बिना फ़ल देते है,यदि कारक ग्रह से मेल नही खाते है तो कष्ट भी अक्समात देते हैं।

३०.यदि किसी नेता की शुरुआत उसके पैतृक जमाने से लगन के अनुरूप है,तो नेता का पुत्र या पुत्री ही आगे की कमान संभालेगी।

३१.जब किसी राज्य का कारक ग्रह अपने संकट सूचक स्थान में आजाता है,तो राज्य का अधिकारी मरता है।

३२.दो आदमियों में तभी आपस में सदभावना होती है,जब दोनो के ग्रह किसी भी प्रकार से अपना सम्पर्क आपस में बना रहे होते है,आपसी सदभावना के लिये मंगल से पराक्रम में,बुध से बातचीत से,गुरु से ज्ञान के द्वारा,शुक्र से धन कमाने के साधनों के द्वारा,शनि से आपस की चालाकी या फ़रेबी आदतों से,सूर्य से पैतृक कारणों से चन्द्र से भावनात्मक विचारों से राहु से पूर्वजों के अनुसार केतु से ननिहाल परिवार के कारण आपस में प्रधान सदभावना प्रदान करते हैं।

३३.दो कुन्डलियों के ग्रहों के अनुसार आपस में प्रेम और नफ़रत का भाव मिलेगा,अगर किसी का गुरु सही मार्ग दर्शन करता है,तो कभी नफ़रत और कभी प्रेम बनता और बिगडता रहता है।

३४.अमावस्या का चन्द्र राशि का मालिक अगर केन्द्र में है तो वह उस माह का मालिक ग्रह माना जायेगा।

३५.जब कभी सूर्य किसी ग्रह के जन्मांश के साथ गोचर करता है,तो वह उस ग्रह के प्रभाव को सजग करता है।

३६.किसी शहर के निर्माण के समय के नक्षत्रों का बोध रखना चाहिये,घर बनाने के लिये ग्रहों का बोध होना चाहिये,इनके ज्ञान के बिना या तो शहर उजड जाते है,या घर बरबाद हो जाते हैं।

३७.कन्या और मीन लगन का जातक स्वयं अपने प्रताप और बल पर गौरव का कारण बनेगा,लेकिन मेष या तुला में वह स्वयं अपनी मौत का कारण बनेगा।

३८.मकर और कुम्भ का बुध अगर बलवान है,तो वह जातक के अन्दर जल्दी से धन कमाने की वृत्ति प्रदान करेगा,और जासूसी के कामों के अन्दर खोजी दिमाग देगा,और अगर बुध मेष राशि का है तो बातों की चालाको को प्रयोग करेगा।

३९.तुला का शुक्र दो शादियां करवा कर दोनो ही पति या पत्नियों को जिन्दा रखता है,जबकि मकर का शुक्र एक को मारकर दूसरे से प्रीति देता है।

४०.लगन पाप ग्रहों से युत हो तो जातक नीच विचारों वाला,कुकर्मो से प्रसन्न होने वाला,दुर्गन्ध को अच्छा समझने वाला होता है।

४१.यात्रा के समय अष्टम भाव में स्थित पापग्रहों से खबरदार रहो,पापग्रहों की कारक वस्तुयें सेवन करना,पापग्रह के कारक आदमी पर विश्वास करना और पाप ग्रह की दिशा में यात्रा करना सभी जान के दुश्मन बन सकते हैं।

४२.यदि रोग का आरम्भ उस समय से हो जब चन्द्रमा जन्म समय के पाप ग्रहों के साथ हो,या उस राशि से जिसमे पाप ग्रह है,से चार सात या दसवें भाव में हो तो रोग भीषण होगा,और रोग के समय चन्द्रमा किसी शुभ ग्रह के साथ हो या शुभ ग्रह से चार सात और दसवें भाव में हो तो जीवन को कोई भय नही होगा।

४३.किसी देश के पाप ग्रहों का प्रभाव गोचर के पाप ग्रहों से अधिक खराब होता है।

४४.यदि किसी बीमार आदमी की खबर मिले और उसकी कुन्डली और अपनी कुन्डली में ग्रह आपस में विपरीत हों तो स्थिति खराब ही समझनी चाहिये।

४५.यदि लगन के मुख्य कारक ग्रह मिथुन कन्या धनु और कुम्भ के प्रथम भाग में न हों,तो जातक मनुष्यता से दूर ही होगा,उसमे मानवता के लिये कोई संवेदना नही होती है।

४६.जन्म कुन्डलियों में नक्षत्रों को महत्व दिया जाता है,अमावस्या की कुन्ड्ली में ग्रहों का मासिक महत्व दिया जाता है,किसी भी देश का भाग्य (पार्ट आफ़ फ़ार्च्यून) का महत्व भी उतना ही जरूरी है।

४७.अगर किसी की जन्म कुन्डली में पाप ग्रह हों और उसके सम्बन्धी की कुन्डली में उसी जगह पर शुभ ग्रह हों,तो पाप ग्रह शुभ ग्रहों को परेशान करने से नही चूकते।

४८.यदि किसी नौकर का छठा भावांश मालिक की कुन्डली का लगनांश हो,तो दोनो को आजीवन दूर नही किया जा सकता है।

४९.यदि किसी नौकर का लगनांश किसी मालिक का दसवांश हो तो मालिक नौकर की बात को मान कर कुंये भी कूद सकता है।

५०.एक सौ उन्नीस युक्तियां ज्योतिष में काम आती है,बारह भाव,बारह राशिया,अट्ठाइस नक्षत्र द्रेष्काण आदि ही ११९ युक्तियां हैं।

५१.जन्म की लगन को चन्द्र राशि से सप्तम मानकर किसी के चरित्र का विश्लेषण करो,देखो कितने गूढ सामने आते है,और जो पोल अच्छे अच्छे नही खोल सकते वे सामने आकर अपना हाल बताने लगेंगीं।

५२.व्यक्ति की लम्बाई का पता करने के लिये लग्नेश दसवांश के पास होने वाला कारक लम्बा होगा,तथा अस्त और सप्तम के पास कारक ठिगना होगा।

५३.पतले व्यक्तियों का लगनेश अक्षांश के पास शून्य की तरफ़ होगा,मोटे व्यक्तियों का अक्षांश अधिक होगा,उत्तर की तरफ़ वाला अक्षांश बुद्धिमान होगा,और दक्षिण की तरफ़ वाला अक्षांश मंद बुद्धि होगा।

५४.घर बनाते समय कारक ग्रहों में कोई ग्रह अस्त भाग २,३,४,४,६,७वें भाव में हो तो उसी कारक के द्वारा घर बनाने में बाधा पडेगी।

५५.यात्रा में मंगल अगर दस या ग्यारह में नही है,तो विघ्न नही होता है,यदि यात्रा के समय मंगल इन स्थानों में है तो यात्रा में किसी न किसी प्रकार की दुर्घटना होती है,या चोरी होती है,अथवा किसी न किसी प्रकार का झगडा फ़साद होता है।

५६.अमावस तक शरीर के दोष बढते है,और फ़िर घटने लगते हैं।

५७.किसी रोग में प्रश्न कुन्डली में अगर सप्तम भाव या सप्तमेश पीडित है तो फ़ौरन डाक्टर को बदल दो।

५८.किसी भी देश की कुन्डली की वर्ष लगन में ग्रह की द्रिष्टि अंशों में नाप कर देखो,घटना तभी होगी जब द्रिष्टि पूर्ण होगी।

५९.किसी बाहर गये व्यक्ति के वापस आने के बारे में विचारो तो देखो कि वह पागल तो नही है,इसी प्रकार से किसी के प्रति घायल का विचार करने से पहले देखो कि उसके खून कही किसी बीमारी से तो नही बह रहा है,किसी के लिये दबे धन को मिलने का विचार कहने से पहले देखो कि उसका अपना जमा किया गया धन तो नही मिल रहा है,कारण इन सबके ग्रह एक सा ही हाल बताते हैं।

६०.रोग के विषय में विचार करो कि चन्द्रमा जब रोग खतरनाक था,तब २२-३० का कोण तो नही बना रहा था,और जब बना रहा था,तो किस शुभ ग्रह की द्रिष्टि उस पर थी,वही ग्रह बीमार को ठीक करने के लिये मान्य होगा।

६१.शरीर के द्वारा मानसिक विचार का स्वामी चन्द्रमा है,वह जैसी गति करेगा,मन वैसा ही चलायमान होगा।

६२.अमावस्या पूर्ण की कुन्डली बनाकर आगामी मास के मौसम परिवर्तन का पता किया जा सकता है,केन्द्र के स्वामी वायु परिवर्तन के कारक है,और इन्ही के अनुसार परिणाम प्रकाशित करना उत्तम होगा।

६३.गुरु शनि का योग दसवें भाव के निकट के ग्रह पर होता है,वह धर्मी हो जाता है,और अपने अच्छे बुरे विचार कहने में असमर्थ होता है।

६४.कार्य के स्वामी को देखो कि वह वर्ष लगन में क्या संकेत देता है,उस संकेत को ध्यान में रखकर ही आगे के कार्य करने की योजना बनाना ठीक रहता है।

६५.कम से कम ग्रह युति का मध्यम युति से और मध्यम युति का अधिकतम युति से विचार करने पर फ़ल की निकटता मिल जाती है।

६६.किसी के गुण दोष विचार करते वक्त कारक ग्रह का विचार करना उचित रहता है,अगर उस गुण दोष में कोई ग्रह बाधा दे रहा है,तो वह गुण और दोष कम होता चला जायेगा।

६७.जीवन के वर्ष आयु के कारक ग्रह की कमजोरी से घटते हैं।

६८.सुबह को उदित पाप ग्रह आकस्मिक दुर्घटना का संकेत देता है,यह अवस्था ग्रह के बक्री रहने तक रहती है,चन्द्र की स्थिति अमावस से सप्तमी तक यानी सूर्य से ९० अंश तक सातवें भाव तक अस्त ग्रह रोग का संकेत करता है।

६९.अगर चन्द्रमा सातवें भाव में है और चौथे भाव में या दसवें भाव में शनि राहु है,तो जातक की नेत्र शक्ति दुर्बल होती है,कारण सूर्य चन्द्र को नही देख पाता है,और चन्द्र सूर्य को नही देख पाता है,यही हाल दुश्मन और घात करने वालों के लिये माना जाता है।

७०.यदि चन्द्रमा बुध से किसी प्रकार से भी सम्बन्ध नही रखता है,तो व्यक्ति के पागलपन का विचार किया जाता है,साथ ही रात में शनि और दिन में मंगल कर्क कन्या या मीन राशि का हो।

७१.सूर्य और चन्द्र पुरुषों की कुन्डली में राशि के अनुसार फ़ल देते है,लेकिन स्त्री की राशि में राशि के प्रभाव को उत्तेजित करते है,सुबह को उदित मंगल और शुक्र पुरुष रूप में है और शाम को स्त्री रूप में।

७२.लगन के त्रिकोण से शिक्षा का विचार किया जाता है,सूर्य और चन्द्र के त्रिकोण से जीवन का विचार किया जाता है।

७३.यदि सूर्य राहु के साथ हो और किसी भी सौम्य ग्रह से युत न हो या किसी भले ग्रह की नजर न हो,सूर्य से मंगल सप्तम में हो,और कोई भला ग्रह देख नही रहा हो,सूर्य से मंगल चौथे और द्सवें में हों,कोई भला ग्रह देख नही रहा हो,तो फ़ांसी का सूचक है,यदि द्रिष्टि मिथुन या मीन में हो,तो अंग भंग होकर ही बात रह जाती है।

७४.लगन का मंगल चेहरे पर दाग देता है,छठा मंगल चोरी का राज छुपाता है।

मनपंसद संतान-प्राप्ति के योग

किस मनुष्य के कैसी सन्तान होगी,इसका पता भी लगाया जा सकता है,जन्म कुन्डली में चलित नवमांश कारकांश के द्वारा जन्म योग है,या नहीं इसका पता लगाना तो असंभव नही तो कठिन अवश्य है। संतान सुख का विचार करने के लिये त्रिकोन १,५,९ स्थान द्वितीय स्थान एकादस स्थान (२,११) से सन्तान सम्बन्धी विचार करना चाहिये।

कुन्डली का पहला भाव

देह भवन यानी शरीर स्थान यह सन्तान के वास्ते महत्वपूर्ण साधन है,जिससे प्रथम देह स्थान का बल होना देखना चाहिये। उसके बाद द्वितीय स्थान जहां कुटुम्ब वृद्धि या वंश वृद्धि का विचार करना चाहिये,उसके बाद पंचम स्थान से संतान सुख का विचार किया जाता है,पांचवें स्थान स पांचवे यानी नवम स्थान को भाग्य स्थान भी इसके लिये महत्वपूर्ण माना जाता है,फ़िर ग्यारहवां भाव जहां से किसी भी वस्तु की प्राप्ति होती है को देखना चाहिये। इसके साथ ही पुत्र कारक गुरु का भी विचार करना चाहिए। सप्तांश,नवमांश कारकांश यह कुन्डली में जन्म के इन पांचों स्थानों के स्वामी की क्या परिस्थिति है,उसका ध्यान होने के बाद सन्तान सम्बन्धी जातक को योग्य मार्गदर्शन देना चाहिये।

ग्रह और संतान

सूर्य मंगल गुरु पुत्र के ग्रह होते है,चन्द्र स्त्री ग्रह है,बुध शुक्र शनि कुन्डली में बलवान होने पर पुत्र या पुत्री का अपने बल के अनुसार फ़ल देते है,सूर्य की सिंह राशि अल्प प्रसव राशि है,और सूर्य जब ग्यारहवें भाव रहकर पांचवें स्थान के सामने होता है,तो एक पुत्र से अधिक का योग नही बनता है,कभी कभी वंश वृद्धि में बाधा भी बनती है। परन्तु सूर्य से अधिक से अधिक एक ही पुत्र का सुख होता है,जब चन्द्र राशि कर्क उसके स्वामी के "चन्द्र कन्या प्रजावान" योग के लिये प्रसिद्ध माना जाता है,यानी चन्द्र राशि कर्क कन्या राशि की अधिकता के लिये माना जाता है। पांचवें स्थान में कर्क राशि को अगर ग्यारहवें भाव से शनि देखता हो तो जातक के सात पुत्रिया भी हो सकती है,और एक पुत्र का योग होता है,और वह पुत्र भी अल्पायु वाला कहा जाता है,लेकिन अगर कर्क राशि में जन्म नही है,तो पर्णाम उल्टा भी देखा जाता है,धनु लगन की कुन्डली में पांचवे स्थान से पुत्र सुख अधिक होता है,शनि पुत्र सुख नही देता है।

कम सन्तान योग

पुत्र के सुख का अभाव तब होता है जब पंचम स्थान दूषित होता है,पंचम स्थान को अगर शनि राहु मंगल अगर कोई भी ग्रह द्रिष्टि दे रहा है,या पंचम के मालिक बारहवें भाव में है,या पंचम और धन स्थान में अशुभ ग्रहों का जोर है तो सन्तान में पुत्र सुख नही मिल पाता है,लेकिन कन्या संतान अवश्य मिलती है।

मनपसन्द सन्तान



स्त्री के ऋतु दर्शन के सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है,उस समय में ही गर्भ धारण हो सकता है,उसके अन्दर पहली चार रातें निषिद्ध मानी जाती है,कारण दूषित रक्त होने के कारण कितने ही रोग संतान और माता पिता में अपने आप पनप जाते है,इसलिये शास्त्रों और विद्वानो ने इन चार दिनो को त्यागने के लिये ही जोर दिया है।

चौथी रात को ऋतुदान से कम आयु वाला पुत्र पैदा होता है,पंचम रात्रि से कम आयु वाली ह्रदय रोगी पुत्री होती है,छठी रात को वंश वृद्धि करने वाला पुत्र पैदा होता है,सातवीं रात को संतान न पैदा करने वाली पुत्री,आठवीं रात को पिता को मारने वाला पुत्र,नवीं रात को कुल में नाम करने वाली पुत्री,दसवीं रात को कुलदीपक पुत्र,ग्यारहवीं रात को अनुपम सौन्दर्य युक्त पुत्री,बारहवीं रात को अभूतपूर्व गुणों से युक्त पुत्र,तेरहवीं रात को चिन्ता देने वाली पुत्री,चौदहवीं रात को सदगुणी पुत्र,पन्द्रहवीं रात को लक्ष्मी समान पुत्री,और सोलहवीं रात को सर्वज्ञ पुत्र पैदा होता है। इसके बाद की रातों को संयोग करने से पुत्र संतान की गुंजायश नही होती है। इसके बाद स्त्री का रज अधिक गर्म होजाता है,और पुरुष के वीर्य को जला डालता है,परिणामस्वरूप या तो गर्भपात हो जाता है,अथवा संतान पैदा होते ही खत्म हो जाती है।

हथेली पर जन्म तारीख

कभी कभी किसी कारणवश जन्म तारीख और दिन माह वार आदि का पता नही होता है,कितनी ही कोशिशि की जावे लेकिन जन्म तारीख का पता नही चल पाता है,जातक को सिवाय भटकने के और कुछ नही प्राप्त होता है,किसी ज्योतिषी से अगर अपनी जन्म तारीख निकलवायी भी जावे तो वह क्या कहेगा,इसका भी पता नही होता है,इस कारण के निवारण के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नही है,किसी भी दिन उजाले में बैठकर एक सूक्षम दर्शी सीसा लेकर बैठ जावें,और अपने दोनो हाथों बताये गये नियमों के अनुसार देखना चालू कर दें,साथ में एक पेन या पैंसिल और कागज भी रख लें,तो देखें कि किस प्रकार से अपना हाथ जन्म तारीख को बताता है।

अपनी वर्तमान की आयु का निर्धारण करें

हथेली मे चार उंगली और एक अगूंठा होता है,अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत,फ़िर पहली उंगली तर्जनी उंगली की तरफ़ जाने पर अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को मंगल पर्वत,तर्जनी के नीचे को गुरु पर्वत और बीच वाली उंगली के नीचे जिसे मध्यमा कहते है,शनि पर्वत,और बीच वाली उंगले के बाद वाली रिंग फ़िंगर या अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत,अनामिका के बाद सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठा कहते हैं,इसके नीचे बुध पर्वत का स्थान दिया गया है,इन्ही पांच पर्वतों का आयु निर्धारण के लिये मुख्य स्थान माना जाता है,उंगलियों की जड से जो रेखायें ऊपर की ओर जाती है,जो रेखायें खडी होती है,उनके द्वारा ही आयु निर्धारण किया जाता है,गुरु पर्वत से तर्जनी उंगली की जड से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें जो कटी नही हों,बीचवाली उंगली के नीचे से जो शनि पर्वत कहलाता है,से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें,की गिनती करनी है,ध्यान रहे कि कोई रेखा कटी नही होनी चाहिये,शनि पर्वत के नीचे वाली रेखाओं को ढाई से और बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलने वाली रेखाओं को डेढ से,गुणा करें,फ़िर मंगल पर्वत के नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली रेखाओं को जोड लें,इनका योगफ़ल ही वर्तमान उम्र होगी।

अपने जन्म का महिना और राशि को पता करने का नियम

अपने दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों के तीसरे पोर और दूसरे पोर में लम्बवत रेखाओं को २३ से गुणा करने पर जो संख्या आये,उसमें १२ का भाग देने पर जो संख्या शेष बचती है,वही जातक का जन्म का महिना और उसकी राशि होती है,महिना और राशि का पता करने के लिये इस प्रकार का वैदिक नियम अपनाया जा सकता है:-

१-बैशाख-मेष राशि

२.ज्येष्ठ-वृष राशि

३.आषाढ-मिथुन राशि

४.श्रावण-कर्क राशि

५.भाद्रपद-सिंह राशि

६.अश्विन-कन्या राशि

७.कार्तिक-तुला राशि

८.अगहन-वृश्चिक राशि

९.पौष-धनु राशि

१०.माघ-मकर राशि

११.फ़ाल्गुन-कुम्भ राशि

१२.चैत्र-मीन राशि

इस प्रकार से अगर भाग देने के बाद शेष १ बचता है तो बैसाख मास और मेष राशि मानी जाती है,और २ शेष बचने पर ज्येष्ठ मास और वृष राशि मानी जाती है।

हाथ में राशि का स्पष्ट निशान भी पाया जाता है

प्रकृति ने अपने द्वारा संसार के सभी प्राणियों की पहिचान के लिये अलग अलग नियम प्रतिपादित किये है,जिस प्रकार से जानवरों में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उम्र की पहिचान की जाती है,उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दाहिने या बायें हाथ की अनामिका उंगली के नीचे के पोर में सूर्य पर्वत पर राशि का स्पष्ट निशान पाया जाता है। उस राशि के चिन्ह के अनुसार महिने का उपरोक्त तरीके से पता किया जा सकता है।

पक्ष और दिन का तथा रात के बारे में ज्ञान करना

वैदिक रीति के अनुसार एक माह के दो पक्ष होते है,किसी भी हिन्दू माह के शुरुआत में कृष्ण पक्ष शुरु होता है,और बीच से शुक्ल पक्ष शुरु होता है,व्यक्ति के जन्म के पक्ष को जानने के लिये दोनों हाथों के अंगूठों के बीच के अंगूठे के विभाजित करने वाली रेखा को देखिये,दाहिने हाथ के अंगूठे के बीच की रेखा को देखने पर अगर वह दो रेखायें एक जौ का निशान बनाती है,तो जन्म शुक्ल पक्ष का जानना चाहिये,और जन्म दिन का माना जाता है,इसी प्रकार अगर दाहिने हाथ में केवल एक ही रेखा हो,और बायें हाथ में अगर जौ का निशान हो तो जन्म शुक्ल पक्ष का और रात का जन्म होता है,अगर दाहिने और बायें दोनो हाथों के अंगूठों में ही जौ का निशान हो तो जन्म कृष्ण पक्ष रात का मानना चाहिये,साधारणत: दाहिने हाथ में जौ का निशान शुक्ल पक्ष और बायें हाथ में जौ का निशान कृष्ण पक्ष का जन्म बताता है।

जन्म तारीख की गणना

मध्यमा उंगली के दूसरे पोर में तथा तीसरे पोर में जितनी भी लम्बी रेखायें हों,उन सबको मिलाकर जोड लें,और उस जोड में ३२ और मिला लें,फ़िर ५ का गुणा कर लें,और गुणनफ़ल में १५ का भाग देने जो संख्या शेष बचे वही जन्म तारीख होती है। दूसरा नियम है कि अंगूठे के नीचे शुक्र क्षेत्र कहा जाता है,इस क्षेत्र में खडी रेखाओं को गुना जाता है,जो रेखायें आडी रेखाओं के द्वारा काटी गयीं हो,उनको नही गिनना चाहिये,इन्हे ६ से गुणा करने पर और १५ से भाग देने पर शेष मिली संख्या ही तिथि का ज्ञान करवाती है,यदि शून्य बचता है तो वह पूर्णमासी का भान करवाती है,१५ की संख्या के बाद की संख्या को कृष्ण पक्ष की तिथि मानी जाती है।

जन्म वार का पता करना

अनामिका के दूसरे तथा तीसरे पोर में जितनी लम्बी रेखायें हों,उनको ५१७ से जोडकर ५ से गुणा करने के बाद ७ का भाग दिया जाता है,और जो संख्या शेष बचती है वही वार की संख्या होती है। १ से रविवार २ से सोमवार तीन से मंगलवार और ४ से बुधवार इसी प्रकार शनिवार तक गिनते जाते है।

जन्म समय और लगन की गणना

सूर्य पर्वत पर तथा अनामिका के पहले पोर पर,गुरु पर्वत पर तथा मध्यमा के प्रथम पोर पर जितनी खडी रेखायें होती है,उन्हे गिनकर उस संख्या में ८११ जोडकर १२४ से गुणा करने के बाद ६० से भाग दिया जाता है,भागफ़ल जन्म समय घंटे और मिनट का होता है,योगफ़ल अगर २४ से अधिक का है,तो २४ से फ़िर भाग दिया जाता है।

इस तरह से कोई भी अपने जन्म समय को जान सकता है।

कुंडली में फ़लादेश के तरीके

इस चित्र में जीवन के चारों पुरुषार्थो का रूप दिया गया है,पहला धर्म का है दूसरा अर्थ का है और तीसरा काम का है और चौथा मोक्ष का पुरुषार्थ दिखाया गया है। इन चारों पुरुषार्थों के लिये ही मानव जीवन का मिलना बताया जाता है। धर्म के पुरुषार्थ में शरीर परिवार पुत्र और विद्या बुद्धि धर्म भाग्य के लिये तीन राशियों का प्रयोग किया गया है,मेष सिंह और धनु राशिया इस पुरुषार्थ के लिये प्रयोग में लायी जाती है,मेष से शरीर नाम पहिचान और शरीर की बनावट आदि के लिये देखा जाता है सिंह से शिक्षा संतान और बुद्धि के साथ जीवन के विकास और प्राथमिक क्षेत्र देखे जाते है धनु से पैत्रिक स्थिति और समाज का स्थान तथा जातक की देश विदेश संस्कार कानून और बडी शिक्षा के लिये देखा जाता है,इसी स्थान से पूजा पाठ और कार्य के लिये बल देने वाले क्षेत्र देखे जाते है,इसके ठीक सामने काम नामका पुरुषार्थ है इसकी राशियों में मिथुन तुला और कुम्भ राशि का वर्णन मिलता है। मिथुन राशि से अपनी पहिचान बनाने के लिये पहने जाने वाले कपडे बोली जाने वाली भाषा तथा जीवन साथी के लिये जो धर्म और परिवार का नियम होता है उसके लिये जाना जाता है तुला राशि से जीवन साथी के प्रभाव के बारे में उसकी शरीर की बनावट उसके रूप और गुणों का प्रभाव देखा जाता है,तथा कुम्भ राशि से काम नामके पुरुषार्थ को साथ लेकर जीवन में कितना संतान और परिवार का बल मिलेगा कार्यों के बाद जो भी प्राप्तियां होंगी वह इसी पुरुषार्थ से पता किया जाता है,काम हमेशा धर्म को देखता है और धर्म हमेशा काम को देखता है। इसके बाद अर्थ का पुरुषार्थ आता है,इस के अन्दर वृष कन्या और मकर राशियां मिलती है,वृष भौतिक धन के मामले में जाना जाता है जो शरीर को पिता के परिवार से मिलता है और जो धन खर्च करने के लिये पास में होता है इसके बाद कन्या राशि से कर्जा दुश्मनी बीमारी और रोजाना के कार्यों को देखा जाता है,जब वृष राशि कमजोर होती है और पास में धन खर्च करने के लिये नही होता है तो अर्थ के लिये व्यक्ति को नौकरी आदि करनी पडती है,और अगर वह नौकरी आदि करने के लिये काबिल नही है तो कर्जा लेना पडता है तथा जो भी धन के लिये जद्दोजहद की जाती है उसके लिये होने वाले दुश्मनी और कार्य के बाद मिलने वाली मुशीबतों से होने वाली बीमारियों के बारे में जाना जाता है,इसके बाद मकर राशि से जो भी धन और रोजाना के कार्य किये जाते है उससे जो द्रश्य कर्म होता है उसके लिये जाना जाता है मकर राशि के बाद ही लाभ या हानि का प्रभाव देखा जाता है,इसके बाद में मोक्ष का भाव आता है,इसके अन्दर कर्क,वृश्चिक और मीन राशियों को देखा जाता है,जो भी जीवन में शरीर से धन कमाया है पुत्र और पुत्री संतान के अलावा जीवनसाथी से जो प्रभाव मिला है वह पहले रहने वाले स्थान के लिये कर्क राशि से जोखिम लेने का बल और मौत होने का कारण वृश्चिक राशि तथा जो लाभ या हानि हुयी है उसके बाद जीवन में वापस आने के लिये निर्णय देने वाली मीन राशि होती है। अर्थ हमेशा मोक्ष को देखता है और मोक्ष हमेशा अर्थ को देखता है। यह जीवन चक्र की संक्षिप्त परिभाषा मानी जाती है।

इस कुंडली में उत्तर भारतीय मानक के अनुसार और लहरी पद्धति के अनुसार गुरु से जीवन के फ़लादेश को करने का तरीका बताया गया है,लिखे गये ग्रहों का विवेचन करने के लिये गुरु को पहले लगन स्थान में लाया गया है,गुरु के पीछे चन्द्रमा है और गुरु के आगे सूर्य और राहु बुध के साथ है। गुरु का सप्तम को देखा जरूर जा रहा है लेकिन गोचर या चन्द्रमा की गति के अनुसार केवल सामयिक देखना ही माना जा सकता है,धर्म भाव में गुरु और मंगल के उपस्थित होने से जातक और जातक का भाई एक साथ है,धन भाव में राहु सूर्य और बुध है,राहु दादा के रूप में है सूर्य पिता के रूप में है और बुध बहिन या बुआ के रूप में है। तीसरे भाव यानी काम के रूप में शनि और शुक्र है,शनि का स्थान व्रुश्चिक राशि में होने के कारण शमशानी या बंजर जमीन और शुक्र के साथ होने से तथा अभावों में जीवन को जीने की कला का विकास माना जा सकता है,मोक्ष के भाव में चन्द्र केतु है,चन्द्रमा को माता तथा केतु को नाना का प्रभाव देने से अन्तगति के लिये ननिहाल का स्थान माना जा सकता है। इस प्रकार से नाम आदि की जानकारी भी गुरु के अनुसार ही मिलती है। लेकिन इसके लिये बाद में लिखा जाना ठीक होगा।

(नोट:- यह लिखा हुआ कापीराइट एक्ट के अधीन है,इस बेवसाइट के लिये पहले से ही भुगतान किया गया है,इसलिये कृपया इसे कापी करने के बाद अपने नाम से नही छापें,अपने अनुसार मेहनत करने के बाद और गणना करने के बाद दिये जाने वाले सुझाव हमारे लिये महत्वपूर्ण है. )



घर में भाग्यशाली कौन ?

जातक की कुंडली जब बनाई जाती है तो परिवार के सदस्यों का हिस्सा अलग अलग भावों के अनुसार माना जाता है। जैसे दसवां भाव पिता के लिये चौथा भाव माता के लिये तीसरा भाव छोटे भाई बहिनो के लिये और ग्यारहवा भाव बडे भाई के लिये,पंचम भाव बडे भाई की पत्नी के लिये नवां भाव छोटे भाई बहिनों के पति और पत्नियों के लिये,बारहवां भाव पिता के छोटे भाई बहिनो के लिये और और छठा भाव चाचियों और छोटे फ़ूफ़ाओं के लिये माना जाता है। आठवां भाव पिता के बडे भाई के लिये और दूसरा भाव ताई के लिये माना जाता है। पिता की माता यानी दादी के लिये लगन को माना जाता है और सप्तम स्थान को पत्नी या पति के साथ दादा का भी माना जाता है। इस तरह से एक ही कुंडली में परिवार की सभी पीढियां जो पीछे गुजर गयीं है और जो आगे आयेंगी सभी का दर्पण द्रश्य होता है। कुंडली में जातक के लिये जातक की पत्नी या पति के लिये,जातक के पुत्र के लिये पुत्री के लिये माता के लिये पिता के लिये छोटे भाई बहिनो और बडे भाई बहिनो के लिये कौन किस तरह से भाग्य का कारक है,या दुर्भाग्य देने वाला है इसके बारे में विवेचन आपके सामने है।

जातक के लिये भाग्यशाली लोग

कुंडली का नवां भाव भाग्य का कारक होता है इस भाव में जो भी ग्रह होते है वे जातक के भाग्य और दुर्भाग्य को बताते है इसके अलावा भाग्य के मालिक जिस भाव में होते है उस भाव की कारक वस्तुयें और व्यक्ति रिस्तेदार जातक के लिये भाग्यशाली माने जाते है। छोटे भाई की पत्नी जातक के लिये भाग्यशाली होती है,उसके द्वारा जो भी पूजा पाठ कार्य आदि किये जाते है वे जातक के लिये भाग्य की वृद्धि करते है। स्वयं जातक अगर अपने छोटे भाई बहिन के पति या पत्नी की मान्यता को रखता है तो भाग्य की बढोत्तरी जीव रूप में अपने आप होने लगती है,अगर किसी रत्न से दस प्रतिशत भाग्य बढता है तो पूजा पाठ से बीस प्रतिशत भाग्य की बढोत्तरी होती है उसी जगह अगर जीव के रूप में या रिस्तेदार के रूप में मान्यता और आदर सत्कार किया जाता है तो भाग्य की पचास प्रतिशत बढोत्तरी होती है। उसी तरीके से पति या पत्नी के भाग्य के लिये उसके छोटे भाई बहिनो के पति पत्नी या जातक के छोटे भाई बहिन उसके लिये भाग्य बढोत्तरी का कार्य करते है। अपने छोटे भाई बहिनों के पति और पत्नियों से भाग्य की बढोत्तरी के लिये उनकी सहायता करना,उनको मानसिक रूप से प्रसन्न रखना,उनके लिये अच्छे अच्छे कार्य करना,उनके खराब समय में सहायता करना,भोजन वस्त्र और रहन सहन के मामले में उसी प्रकार से देखभाल करना जैसे मंदिर में जाकर भगवान को सजाते है,उनके लिये नित्य भोग का प्रावधान करते है,साफ़ सफ़ाई और उनके लिये ख्याल करते है,इस तरह से अपने से छोटे भाई बहिनो के पति और पत्नियों के लिये किये जाने वाले कार्य भाग्य का वर्धन करने वाले होते है।

जातक की पत्नी या पति के लिये भाग्य के कारक रिस्तेदार

जिस तरीके से जातक के प्रति जातक के छोटे भाई बहिन के पति और पत्नियां भाग्य की बढोत्तरी करने वाले होते है उसी तरह से जातक के जीवन साथी के लिये जातक के छोटे भई बहिन भाग्य के कारक होते है। अक्सर यह कारण देवर भाभी के लिये देखा जा सकता है,और अक्सर जिन देवर भाभियों में आपस का प्रेम होता है उनके घर हमेशा फ़लते फ़ूलते ही देखे जा सकते है। पत्नी के लिये छोटा बहनोई जो छोटी ननद का पति होता है वह भी भाग्य बढाने के लिये माना जाता है,अक्सर जो लोग इस प्रकार के सम्बन्धी की आवभगत और इज्जत आदि बढाने के साथ मर्यादा की पालना करते है वे अपने भाग्य को बढाने की कामना ही करते है,अगर इन रिस्तेदारों में कोई रिस्तेदार रूठा हुआ है तो मान लेना चाहिये कि भाग्य का पाया वहीं से कमजोर माना जायेगा,अक्सर लोगों को देखा जाता है कि अपने जीवित ग्रहों से सम्बन्धित लोगों को तिरस्कार देने के बाद वे पूजा पाठ और भक्ति के स्थानों की तलास में रहते है,लेकिन उन्हे अगर अपने ही घर के अन्दर के ग्रहों को पूजा पाठ की बजाय मान मर्यादा और इज्जत से रखा जाये और उन्हे उनके समय पर बुलाया जाये,उन्हे खिलाना पिलाना उनके ऊपर खर्च करना आदि किया जाये तो सम्बन्ध भी मधुर बनते है और आगे की जिन्दगी भी उन्नति के लिये अग्रसर होती है। पति के छोटे भाई की बात अभी मैने ऊपर बतायी है,अक्सर देखा जाता है कि पति के छोटे भाई का स्थान पत्नी के लिये नवें स्थान से देखा जाता है,और देवरानी तीसरे भाव के लिये पराक्रम बढाने वाली होती है,अगर देवरानी के द्वारा अपनी मर्यादा को आगे बढाने वाली बात की जाये तो नाम के साथ इज्जत की भी बढोत्तरी होती है,भले ही वह अपने घर से आयी थी तो कई प्रकार के अवगुण उसके पास थे,अगर धर्म से देवर के साथ बर्ताव किया जाये और देवरानी को अपने लिये सहायता के कामो में रखा जाये तो वह जरूर ही आपके लिये साथ देने वाली होगी,लेकिन हम यह नही सोच पाते है,हम अपने अपने अहम के कारण अपने ही रिस्तेदार को छोड कर दूर के भगवान को पूजने जाते है वहां अन्जान लोगों की संगति में अन्जान स्थान के खानपीन से परेशान हो लेते है लेकिन अपने अहम के कारण घर के मान्य सदस्यों से दूरी अच्छी लगती है।

छोटे भाई बहिनों के लिये भाग्य वर्धक सदस्य

घर में छोटे भाई बहिनो के लिये भी भाग्य वर्धक लोग होते है,जैसे तीसरे भाव से नवां भाव ग्यारहवां भाव होता है,बडे भाई का घर माना जाता है,जातक के मित्रों का भाव माना जाता है,जैसे बडे भाई का आदर सत्कार करते है वैसे ही जातक के मित्रों का आदर सत्कार अगर छोटे भाई बहिन करते है तो वे भी समय पर भाग्य बढाने का काम करते है,अगर कोई छोटा भाई बहिन दुखी है और जातक पास में नही है तो वह जातक के मित्रों को अपनी सहायता के लिये पुकार सकते है,और जब उनका पहले से आदर सत्कार किया गया होगा तो वे बडे आराम से सहायता के लिये भागे आयेंगे। इसके अलावा भी पिता के कुटुम्ब के लोग भी इसी घर से अपना सम्बन्ध रखते है,जातक के जीवन साथी के घर से भी और शिक्षा के स्थान के लोग इस स्थान से सम्बन्ध रखते है,माता के ताऊ भी इसी स्थान से सम्बन्ध रखते है.

बडे भाई बहिनो के लिये भाग्य वर्धक सदस्य

बडे भाई से नवे भाव में जातक का सप्तम भाव आता है,यह भाव जातक की पत्नी या पति का होता है,जातक के जीवन साथी का जुडना बडे भाई के लिये भाग्य वर्धक माना जाता है।

जाने सैकड़ो रोगों का इलाज !

सहजन पेड़ मनुष्य के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं दुनीया का सबसे ताकतवर पोषण पुरक आहार है सहजन (मुनगा) 300 से अधि्क रोगो मे बहोत फा...