Wednesday, March 25, 2015

Moles Significance


कुछ न कुछ जरूर कहता है आपके शरीर पर तिल


लगभग हर पुरूष व स्त्री के किसी न किसी अंग पर तिल अवश्य पाया जाता है। उस तिल का महत्व क्या है? शरीर के किस हिस्से पर तिल का क्या फल मिलता है। ज्योतिष के अभिन्न अंग सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार शरीर के किसी भी अंग पर तिल होना एक अलग संकेत देता है। यदि तिल चेहरे पर कहीं भी हो, तो आप व्यक्ति के स्वभाव को भी समझ सकते हैं। खास बात यह है कि पुरुष के दाहिने एंव सत्री के बायें अंग पर तिल के फल को शुभ माना जाता है। वहीं अगर बायें अंगों पर हो तो मिले जुले परिणाम मिलते हैं। इससे पहले कि हम आपको बतायें कि शरीर के किस अंग पर तिल होने के क्या प्रभाव होते हैं, हम आपको बतायेंगे कुछ अंगों के नाम और वो इंसान के व्यक्तित्व को किस तर उल्लेखित करते हैं। यह भी सामुद्रिक शास्त्र की एक विधा है, जिसमें इंसान के व्यक्ति को उसके अंगों को देख पहचान सकते हैं। उदाहरण के तौर पर- जैसे जिन पुरुषों के कंधे झुके हुए होते हैं, वो शालीन स्वभाव के और गंभीर होते हैं। वहीं चौड़ी छाती वाले पुरुष धनवान होते हैं तो लाल होंठ वाले पुरुष साहसी होते हैं। वहीं महिलाओं का पेट, वक्ष और होंठ से लेकर लगभग सभी प्रमुख अंग कुछ न कुछ कहते हैं।
माथे पर दायीं ओर
माथे के दायें हिस्से पर तिल हो तो- धन हमेशा बना रहता है।
माथे पर बायीं ओर
माथे के बायें हिस्से पर तिल हो तो- जीवन भर कोई न कोई परेशानी बनी रहती है।
ललाट पर तिल
ललाट पर तिल होने से- धन सम्पदा व ऐश्वर्य का भोग करता है।
ठुड्डी पर तिल
ठुड्डी पर तिल होने से- जीवन साथी से मतभेद रहता है।
दायीं आंख के ऊपर
दांयी आंख के ऊपर तिल हो तो-जीवन साथी से हमेशा और बहुत ज्यादा प्रेम मिलता है।
बायीं आंख के ऊपर
बायीं आंख पर तिल हो तो- जीवन में संघर्ष व चिन्ता बनी रहेगी।
दाहिने गाल पर
दाहिने गाल पर तिल हो तो- धन से परिपूर्ण रहेगें।
बायें गाल पर
बायें गाल पर तिल हो तो- धन की कमी के कारण परेशान रहेंगे।
होंठ पर तिल
होंठ पर तिल होने से- काम चेतना की अधिकता रहेगी।
होंठ के चीने
होंठ के नीचे तिल हो तो- धन की कमी रहेगी।
होंठ के ऊपर तिल
होंठ के उपर तिल हो तो- व्यक्ति धनी होता है, किन्तु जिद्दी स्वभाव का होता है।
बायें कान पर
बायें कान पर तिल हो तो- दुर्घटना से हमेशा बच कर रहना चाहिये।
दाहिने कान पर
दाहिने कान पर तिल होने से- अल्पायु योग किन्तु उपाय से लाभ होगा।
गर्दन पर तिल
गर्दन पर पर तिल हो तो- जीवन आराम से व्यतीत होगा, यक्ति दीर्घायु, सुविधा सम्पन्न तथा अधिकारयुक्त होता है।
दाहिनी भुजा पर
दायीं भुजा पर पर तिल हो तो- साहस एंव सम्मान प्राप्त होगा।
बायीं भुजा
बायीं भुजा पर तिल होने से- पुत्र सन्तान होने की संभावना होती है और पुत्र से सुख की प्राप्ति होती है।
छाती पर दाहिनी ओर
छाती पर दाहिनी ओर तिल होने से- जीवन साथी से प्रेम रहेगा।
छाती पर बायीं ओर
छाती पर बायीं ओर तिल होने से- जीवन में भय अधिक रहेगा।
नाक पर तिल
नाक पर तिल हो तो- आप जीवन भर यात्रा करते रहेंगे।
दायीं हथेली पर
दायीं हथेली पर तिल हो तो- धन लाभ अधिक होगा।
बायीं हथेली पर
बायीं हथेली पर पर तिल हो तो- धन की हानि होगी।
पैर पर तिल
पांव पर तिल होने से- यात्रायें अधिक करता है।
भौहों के मध्य
भौहों के मध्य तिल हो तो- विदेश यात्रा से लाभ मिलता है।
जांघ पर तिल
जांघ पर तिल होने से- ऐश्वर्यशली होने के साथ अपने धन का व्यय भोग-विलास में करता है। उसके पास नौकरों की कमी नहीं रहती है।
स्त्री की भौहों पर
स्त्री के भौंहो के मध्य तिल हो तो- उस स्त्री का विवाह उच्चाधिकारी से होता है।
कमर पर
कमर पर तिल होने से- भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है।
पीठ पर तिल
पीठ पर तिल हो तो- जीवन दूसरे के सहयोग से चलता है एंव पीठ पीछे बुराई होगी।
नाभि पर तिल
नाभि पर तिल होने से- कामुक प्रकृति एंव सन्तान का सुख मिलता है।
बायें कंधे पर
बायें कंधे पर तिल हो तो- मन में संकोच व भय रहेगा।
दायें कंधे पर
दायें कंधें पर तिल हो तो- साहस व कार्य क्षमता अधिक होती है।

Saturday, March 21, 2015

वास्तु & ज़रूरी उपाय

                                             वास्तु : मकान बनाने से पहले याद रखें यह 5 बातें
वास्तु : मकान के लिए कैसी भूमि का चयन करें
 1. भूमि-परीक्षा- भूमि के मध्य में एक हाथ लंबा, एक हाथ चौड़ा व एक हाथ गहरा गड्ढा खोदें। खोदने के बाद निकली हुई सारी मिट्टी पुन: उसी गड्ढे में भर दें। यदि गड्ढा भरने से मिट्टी भर जाए तो वह उत्तम भूमि है। यदि मिट्टी गड्ढे के बराबर निकलती है तो वह मध्यम भूमि है और यदि गड्ढे से कम निकलती है तो वह अधम भूमि है।
 दूसरी विधि- उपर्युक्त प्रकार से गड्ढा खोदकर उसमें पानी भर दें और उत्तर दिशा की ओर सौ कदम चलें, फिर लौटकर देखें। यदि गड्ढे में पानी उतना ही रहे तो वह उत्तम भूमि है। यदि पानी कम (आधा) रहे तो वह मध्यम भूमि है और यदि बहुत कम रह जाए तो वह अधम भूमि है। अधम भूमि में निवास करने से स्वास्थ्य और सुख की हानि होती है।
 ऊसर, चूहों के बिल वाली, बांबी वाली, फटी हुई, ऊबड़-खाबड़, गड्ढों वाली और टीलों वाली भूमि का त्याग कर देना चाहिए।
 जिस भूमि में गड्ढा खोदने पर राख, कोयला, भस्म, हड्डी, भूसा आदि निकले, उस भूमि पर मकान बनाकर रहने से रोग होते हैं तथा आयु का ह्रास होता है।
  2. भूमि की सतह- पूर्व, उत्तर और ईशान दिशा में नीची भूमि सब दृष्टियों से लाभप्रद होती है। आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य और मध्य में नीची भूमि रोगों को उत्पन्न करने वाली होती है।
 दक्षिण तथा आग्नेय के मध्य नीची और उत्तर एवं वायव्य के मध्य ऊंची भूमि का नाम 'रोगकर वास्तु' है, जो रोग उत्पन्न करती है।
 3. गृहारम्भ- वैशाख, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष और फाल्गुन मास में गृहारंभ करना चाहिए। इससे आरोग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
 नींव खोदते समय यदि भूमि के भीतर से पत्थर या ईंट निकले तो आयु की वृद्धि होती है। यदि राख, कोयला, भूसी, हड्डी, कपास, लोहा आदि निकले तो रोग तथा दु:ख की प्राप्ति होती है।
 4. वास्तुपुरुष के मर्मस्‍थान- सिर, मुख, हृदय, दोनों स्तन और लिंग- ये वास्तुपुरुष के मर्मस्थान हैं। वास्तुपुरुष का सिर 'शिखी' में, मुख 'आप्' में, हृदय 'ब्रह्मा' में, दोनों स्तन 'पृथ्वीधर' तथा 'अर्यमा' में और लिंग 'इन्द्र' तथा 'जय' में है (देखे- वास्तुपुरुष का चार्ट)। वास्तुपुरुष के जिस मर्मस्थान में कील, खंभा आदि गाड़ा जाएगा, गृहस्वामी के उसी अंग में पीड़ा या रोग उत्पन्न हो जाएगा।
  5. गृह का आकार- चौकोर तथा आयताकार मकान उत्तम होता है। आयताकार मकान में चौड़ाई की दुगुनी से अधिक लंबाई नहीं होनी चाहिए। कछुए के आकार वाला घर पीड़ादायक है। कुंभ के आकार घर कुष्ठ रोग प्रदायक है। तीन तथा छ: कोन वाला घर आयु का क्षयकारक है। पांच कोन वाला घर संतान को कष्ट देने वाला है। आठ कोन वाला घर रोग उत्पन्न करता है।
 घर को किसी एक दिशा में आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। यदि बढ़ाना ही है तो सभी दिशाओं में समान रूप से बढ़ाना चाहिए। यदि घर वायव्य दिशा में आगे बढ़ाया जाए तो वात-व्याधि होती है। यदि वह दक्षिण दिशा में बढ़ाया जाए तो मृत्यु-भय होता है। उत्तर दिशा में बढ़ाने पर रोगों की उत्पत्ति होती है।

                                             वास्तु अनुसार कैसे करें भवन का निर्माण

हर किसी की आंखों में खूबसूरत घर का सपना रहता है। यह सपना साकार करने के लिए हम तमाम जतन भी करते हैं। जितना ध्यान हम घर के बाहरी खूबसूरती पर देते हैं, उतना ही घर के अंदर का वास्तु भी महत्वपूर्ण हैं। आइए जानते है भवन के अंदर का वास्तु कैसा होना चाहिए।
 * पूजा घर या अध्ययन कक्ष उत्तर-पूर्व (ईशान) में बनाना लाभकारी है।
 * अपने रसोईघर को दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम में बनवाएं।
 * रसोईघर का निर्माण अगर दिशा-निर्देश को ध्यान में रखकर किया जाए, तो भोजन तो स्वादिष्ट बनता ही है, साथ ही आर्थिक दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण है।
 * मकान का ड्राइंग रूम उत्तर-पूर्व, उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए।
 * प्रवेश द्वार भी आप इन्हीं दिशाओं में बना सकते हैं।
 * अगर आपके प्लॉट के अनुसार, इन दिशाओं में प्रवेश द्वार बनाना संभव नहीं है तो कुशल वास्तु विशेषज्ञ से परामर्श लेकर प्रवेश द्वार हेतु निर्णय लेना चाहिए।
 * वास्तु के अनुसार यूं तो टॉयलेट घर में नहीं होना चाहिए, लेकिन आजकल यह संभव नहीं है। इसलिए इसे पश्चिम, दक्षिण या उत्तर-पश्चिम दिशा में बनवाना चाहिए।
 * परिवार के मुखिया और उसकी पत्नी के लिए घर का मास्टर बेडरूम दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम या दक्षिण दिशा में हो।
                                      वास्तु : मकान बनाते समय यह 5 बातें कभी ना भूलें

1 . गृह‍ निर्माण की सामग्री- ईंट, लोहा, पत्थर, मिट्टी और लकड़ी- ये नए मकान में नए ही लगाने चाहिए। एक मकान में उपयोग की गई लकड़ी दूसरे मकान में लगाने से गृहस्वामी का नाश होता है।
 मंदिर, राजमहल और मठ में पत्थर लगाना शुभ है, पर घर में पत्‍थर लगाना शुभ नहीं है।
 पीपल, कदम्ब, नीम, बहेड़ा, आम, पाकर, गूलर, रीठा, वट, इमली, बबूल और सेमल के वृक्ष की लकड़ी घर के काम में नहीं लेनी चाहिए।
 2 . गृह के समीपस्थ वृक्ष- आग्नेय दिशा में वट, पीपल, सेमल, पाकर तथा गूलर का वृक्ष होने से पीड़ा और मृत्यु होती है। दक्षिण में पाकर वृक्ष रोग उत्पन्न करता है। उत्तर में गूलर होने से नेत्ररोग होता है। बेर, केला, अनार, पीपल और नीबू- ये जिस घर में होते हैं, उस घर की वृद्धि नहीं होती।
 घर के पास कांटे वाले, दूध वाले और फल वाले वृक्ष हानिप्रद हैं।
 पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा, पीपल, कपित्थ, बेर, निर्गुण्डी, इमली, कदम्ब, बेल तथा खजूर- ये सभी वृक्ष घर के समीप अशुभ हैं।
 3. गृह के समीपस्थ अशुभ वस्तुएं- देव मंदिर, धूर्त का घर, सचिव का घर अथवा चौराहे के समीप घर होने से दु:ख, शोक तथा भय बना रहता है।
 4 . मुख्य द्वार- जिस दिशा में द्वार बनाना हो, उस ओर मकान की लंबाई को बराबर नौ भागों में बांटकर पांच भाग दाएं और तीन भाग बाएं छोड़कर शेष (बाईं ओर से चौथे) भाग में द्वार बनाना चाहिए। दायां और बायां भाग उसको माने, जो घर से बाहर निकलते समय हो।
 पूर्व अथवा उत्तर में स्‍थित द्वार सुख-समृद्धि देने वाला होता है। दक्षिण में स्थित द्वार विशेष रूप से स्त्रियों के लिए दु:खदायी होता है।
 द्वार का अपने आप खुलना या बंद होना अशुभ है। द्वार के अपने आप खुलने से उन्माद रोग होता है और अपने आप बंद होने से दुख होता है।
 5 . द्वार-दोष-  मुख्य द्वार के सामने मार्ग या वृक्ष होने से गृहस्वामी को अनेक रोग होते हैं। कुआं होने से मृगी तथा अतिसार रोग होता है। खंभा एवं चबूतरा होने से मृत्यु होती है। बावड़ी होने से अतिसार एवं संनिपात रोग होता है। कुम्हार का चक्र होने से हृदय रोग होता है। शिला होने से पथरी रोग होता है। भस्म होने से बवासीर रोग होता है।
 यदि घर की ऊंचाई से दुगुनी जमीन छोड़कर वैध-वस्तु हो तो उसका दोष नहीं लगता।
जानिए, वास्तु अनुरूप कैसा रंग करवाएं कमरों में
रंगों का हमारे जीवन पर गहरा असर पड़ता है। जीवन की शांति के लिए और मन की प्रसन्नता के लिए इस दीपावली पर रंगों का कैसे करें घर में इस्तेमाल, बता रही हैं वास्तुविद् रेखा जोशी -
* नीला या बैंगनी रंग शांति का प्रतीक है ,इसे बेडरूम में या ध्यान कक्ष में इस्तेमाल करना चाहिए।
 * बच्चों के कमरे के लिए हरा रंग शुभ है ,यह रंग उन्नति का प्रतीक है।
*  घर के पूजाकक्ष के लिए पीला रंग उत्तम माना गया है।
 * घर के स्टडी रूम के लिए भी पीला रंग श्रेष्ठ है।
 * अगर आपका बेडरूम उत्तर दक्षिण दिशा में है तो वहां सफेद रंग करवाना शुभ माना गया है।
 * घर के अंदर की तरफ की छतों पर भी सफेद रंग लगवाना शुभ है।

                                   कैसे जानें घर की शुभता पढ़ें 'इन्द्र-काल-राजा'

वास्तु शास्त्र में शुभ और अशुभ को जानने का बेहद रोचक तरीका प्रचलित है। आइए जानते हैं-
 घर की सीढ़ियां, खंभे, खिड़कियां, दरवाजे आदि की 'इन्द्र-काल-राजा'- इस क्रम से गणना करें। यदि अंत में 'काल' आए तो अशुभ समझना चाहिए। इन्द्र आए तो शुभ और राजा आए तो मध्यम। 
वास्तु : पूजा घर ऐसा कि देवता भी ठहर जाए
वास्तु विज्ञान के अनुसार देवी-देवताओं की कृपा घर पर बनी रहे, इसके लिए पूजाघर वास्तुदोष से मुक्त होना चाहिए। जहां पूजाघर वास्तुदोष के नियमों के विपरीत होता है, वहां ध्यान और पूजा करते समय मन एकाग्र नहीं रह पाता है। इससे पूजा-पाठ का पूर्ण लाभ नहीं मिलता है।
 वास्तु विज्ञान के अनुसार पूजाघर पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होना चाहिए। इन दिशाओं में पूजाघर होने पर घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। पूजाघर के ऊपर अथवा इसके अगल-बगल में शौचालय या स्नानघर नहीं होना चाहिए। आजकल बहुत से लोग सीढ़ी के नीचे या तहखाने में पूजाघर बनवा लेते हैं, जो वास्तु के अनुसार उचित नहीं है।
अगर एक ही घर में कई लोग रहते हैं तो अलग-अलग पूजाघर बनवाने की बजाए मिल-जुलकर एक पूजाघर बनवाएं। एक ही मकान में कई पूजाघर होने पर घर के सदस्यों को मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भगवान को एक-दूसरे से कम से कम 1 इंच की दूरी पर रखें। अगर घर में एक ही भगवान की दो तस्वीरें हों तो दोनों को आमने-सामने बिलकुल न रखें। एक ही भगवान के आमने-सामने होने पर घर में आपसी तनाव बढ़ता है।
 अगर जगह की कमी के कारण शयन कक्ष में ही पूजाघर बनाना पड़े तो ध्यान रखें कि बिछावन इस प्रकार हो ताकि सोते समय भगवान की ओर पैर नहीं हो।
वास्तु : कैसा हो दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का स्थान
ईशान कोण में करें महालक्ष्मी पूजन
 धन-वैभव और सौभाग्य प्राप्ति के लिए दीपावली की रात्रि को लक्ष्मीपूजन श्रेष्ठ माना गया है। पूजास्थल तैयार करते समय दिशाओं का भी उचित समन्वय रखना जरूरी है।
पूजा का स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर बनाना शुभ है। इस दिशा के स्वामी भगवान शिव हैं, जो ज्ञान एवं विद्या के अधिष्ठाता हैं।
  पूजास्थल पूर्व या उत्तर दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है। पूजास्थल को सफेद या हल्के पीले रंग से रंगें। ये रंग शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक प्रगति के प्रतीक हैं।
 देवी-देवताओं की मूर्तियां तथा चित्र पूर्व-उत्तर दीवार पर इस प्रकार रखें कि उनका मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की तरफ रहे।
 पूजा कलश पूर्व दिशा में उत्तरी छोर के समीप रखा जाए तथा हवनकुंड या यज्ञवेदी का स्थान पूजास्थल के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) की ओर रहना चाहिए।

                             वास्तु फेंगशुई : क्या करें जब घर में हो नकारात्मक ऊर्जा

हम जिस स्थान पर रहते हैं, उसे वास्तु कहते हैं। इसलिए जिस जगह रहते हैं, उस मकान में कौन-सा दोष है, जिसके कारण हम दुःख-तकलीफ उठाते हैं, इसे स्वयं नहीं जान सकते। हमें यह भी पता नहीं रहता कि उस घर में नकारात्मक ऊर्जा है या सकारात्मक। किस स्थान पर क्या दोष है, लेकिन यहां पर कुछ सटीक वास्तुदोष निवारण के उपाय दिए जा रहे हैं, जिसके प्रयोग से हम आप सभी लाभान्वित होंगे।
ईशान अर्थात ई-ईश्वर, शान-स्थान। इस स्थान पर भगवान का मंदिर होना चाहिए एवं इस कोण में जल भी होना चाहिए। यदि इस दिशा में रसोई घर हो या गैस की टंकी रखी हो तो वास्तुदोष होगा। अतः इसे तुरंत हटाकर पूजा स्थान बनाना चाहिए या फिर इस स्थान पर जल रखना चाहिए।
पूर्व दिशा में बाथरूम शुभ रहता है। खाना बनाने वाला स्थान सदैव पूर्व अग्निकोण में होना चाहिए।
भोजन करते वक्त दक्षिण में मुंह करके नहीं बैठना चाहिए।
शयन कक्ष प्रमुख व्यक्तियों का नैऋत्य कोण में होना चाहिए। बच्चों को वायण्य कोण में रखना चाहिए।
शयनकक्ष में सोते समय सिर उत्तर में, पैर दक्षिण में कभी न करें।
अग्निकोण में सोने से पति-पत्नी में वैमनस्यता रहकर व्यर्थ धन व्यय होता है।
ईशान में सोने से बीमारी होती है।
पश्चिम दिशा की ओर पैर रखकर सोने से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।
उत्तर की ओर पैर रखकर सोने से धन की वृद्धि होती है एवं उम्र बढ़ती है।
बेडरूम में टेबल गोल होना चाहिए।
बीम के नीचे व कालम के सामने नहीं सोना चाहिए।
बच्चों के बेडरूम में कांच नहीं लगाना चाहिए।
मिट्टी और धातु की वस्तुएं अधिक होना चाहिए।
ट्यूबलाइट की जगह लैम्प होना चाहिए।
फेंगशुई के अनुसार घर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व व अग्नि कोण के द्वार का रंग सदैव हरा या ब्ल्यू रखना चाहिए।
दक्षिण दिशा के प्रवेश द्वार का रंग हरा, लाल, बैंगनी, केसरिया होना चाहिए। नैऋत्य और ईशान कोण का प्रवेश द्वार हरे रंग का या पीला केसरी या बैंगनी होना चाहिए। पश्चिम और वायव्य दिशा का प्रवेश द्वार सफेद या सुनहरा होना चाहिए।
उत्तर दिशा का प्रवेश द्वार आसमानी सुनहरा या काला होना चाहिए।
वास्तु-फेंगशुई : जानिए कछुए को क्यों रखें घर में..
वास्तु फेंगशुई के अनुसार कछुआ उत्तर दिशा का संरक्षक है।
घर की उत्तर दिशा में धातु की प्लेट में पानी भरकर एक कछुआ रखें। कछुए का मुंह उत्तर दिशा में होना चाहिए। कछुआ उम्र को बढ़ाने वाला और जीवन में प्रगति दिलाने वाला होता है।

                                          वास्तुशास्त्र में भी है पालतू पशु-पक्षी का महत्व

आज के हाईटेक युग में भी अधिकांश लोग किसी प्राणी के रंग के साथ शगुन-अपशगुन को जोड़कर देखने का प्रयत्न करते हैं। घर में कोई प्राणी या पक्षी पालने के पहले अक्सर ज्योतिष-वास्तुशास्त्र की सलाह ली जाती है। प्राणियों और पक्षियों में अनिष्ट तत्वों को काबू में रखने की अद्भुत शक्तियाँ होती हैं। इस ब्रह्मांड में व्याप्त नकारात्मक शक्तियों को निष्क्रिय बनाने की ताकत इन पालतू प्राणियों में होती है।
मानव का सबसे वफादार मित्र कुत्ता भी नकारात्मक शक्तियों को खत्म कर सकता है। उसमें भी काला कुत्ता सबसे ज्यादा उपयोगी सिद्ध होता है। प्रसिद्ध ज्योतिषी जयप्रकाश लाल धागेवाले कहते हैं- 'यदि संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो काले कुत्ते को पालने से संतान की प्राप्ति होती है।' वैसे काले रंग से बहुतों को चिढ़ हो सकती है, पर यह शुभ है।
तद्नुसार काले कौवे को भोजन करने (कराने) से अनिष्ट व शत्रु का नाश होता है। अलबत्ता कौवा बहुत डरपोक होता है और मानव से बहुत घबराता है। कौवे को एक ही आंख से दिखाई देता है।
शुक्र देवता भी एकांक्षी हैं। शुक्र जैसे ही शनि देवता हैं। उनकी भी एक ही दृष्टि है। अतः शनि को प्रसन्न करना हो तो कौवों को भोजन कराना चाहिए। घर की मुंडेर पर कौवा बोले तो मेहमान जरूर आते हैं। परंतु यह भी कहा गया कि कौवा घर की उत्तर दिशा में बोले तो घर में लक्ष्मी आती है, पश्चिम दिशा में मेहमान, पूर्व में शुभ समाचार और दक्षिण दिशा में बोले तो माठा (बुरा) समाचार आता है।
 हमारे शास्त्रों में गाय के संबंध में अनेक बातें लिखी हुई हैं जैसे- शुक्र की तुलना सुंदर स्त्री से की जाती है। इसे गाय के साथ भी जोड़ते हैं। अतः शुक्र के अनिष्ट से बचने के लिए गौ-दान का प्रावधान है। जिस भू-भाग पर मकान बनाना हो तो पंद्रह दिन तक गाय-बछड़ा बांधने से वह जगह पवित्र हो जाती है। भू-भाग से बहुत सी आसुरी शक्तियों का नाश हो जाता है।
तोते का हरा रंग बुध ग्रह के साथ जोड़कर देखा जाता है। अतः घर में तोता पालने से बुध की कुदृष्टि का प्रभाव दूर होता है। घोड़ा पालना भी शुभ है। सभी लोग घोड़ा पाल नहीं सकते फिर काले घोड़े की नाल को घर में रखने से शनि के कोप से बचा जा सकता है।
मछलियों को पालने व आटे की गोलियां खिलाने से अनेक दोष दूर होते हैं। इसके लिए सात प्रकार के अनाज के आटे का पिंड बना लें। अपनी उम्र के वर्ष बराबर बार पिंड को शरीर से उतार लें। फिर अपनी उम्र जितनी गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं।
घर में फिश-पॉट (मछली पात्र) रखने की सलाह भी देते हैं जो सुख-समृद्धिदायक है। कहा जाता है कि मछली अपने मालिक पर आने वाली विपदा को अपने ऊपर ले लेती है।
कबूतरों को शिव-पार्वती के प्रतीक रूप माना जाता है, परंतु वास्तुशास्त्र की दृष्टि से कबूतर बहुत अपशगुनी माना जाता है।
दुनिया के अधिकांश देशों में बिल्ली का दिखना अपशगुन माना जाता है। काली बिल्ली को अंधकार का प्रतीक माना जाता है।
अनोखी बात यह भी है कि ब्रिटेन में काली बिल्ली को शुभ माना जाता है।
अंत में कुत्ते के बारे में एक बात और यह कि कुत्ता पालने से लक्ष्मी आती है और कुत्ता घर के रोगी सदस्य की बीमारी अपने ऊपर ले लेता है।
गुरुवार को हाथी को केले खिलाने से राहु और केतु के नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं।
 सीढ़ियों में हो वास्तु दोष तो यह जरूर करें...
तरक्की चाहते हैं तो घर की सीढ़ी पर ध्यान दें
  वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की सीढ़ियों से तरक्की की ऊंचाई पर भी पहुंचा जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि घर की सीढ़ी वास्तु नियमों के अनुसार बनी हो। सीढ़ी में वास्तुदोष होने पर तरक्की के बजाय नुकसान उठाना पड़ सकता है।
 वास्तुशास्त्र के नियम के अनुसार सीढ़ियों का निर्माण उत्तर से दक्षिण की ओर अथवा पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर करवाना चाहिए। जो लोग पूर्व दिशा की ओर से सीढ़ी बनवा रहे हों उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ी पूर्व दिशा की दीवार से लगी हुई नहीं हो। पूर्वी दीवार से सीढ़ी की दूरी कम से कम 3 इंच होने पर घर वास्तुदोष से मुक्त होता है।
 सीढ़ी के लिए नैऋत्य यानी दक्षिण दिशा उत्तम होती है। इस दिशा में सीढ़ी होने पर घर प्रगति की ओर अग्रसर रहता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में सी‍ढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए। इससे आर्थिक नुकसान, स्वास्थ्य की हानि, नौकरी एवं व्यवसाय में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस दिशा में सीढ़ी का होना अवनति का प्रतीक माना गया है। दक्षिण पूर्व में सी‍ढ़ियों का होना भी वास्तु के अनुसार नुकसानदेय होता है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव बना रहता है।
 जो लोग खुद ग्राउंड फ्लोर पर रहते हैं और किराएदारों को ऊपरी मंजिल पर रखते हैं उन्हें मुख्य द्वार के सामने सी‍ढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए। वास्तु विज्ञान के अनुसार इससे किराएदार दिनोदिन उन्नति करते और मालिक की परेशानी बढ़ती रहती है।

                                          सी‍ढ़ियों के वास्तुदोष को दूर करने के उपाय

1. सी‍ढ़ियों के आरंभ और अंत में द्वार बनवाएं।
2. सीढ़ी के नीचे जूते-चप्पल एवं घर का बेकार सामान नहीं रखें।
3. मिट्टी के बर्तन में बरसात का जल भरकर उसे मिट्टी के ढक्कन से ढंक दें।
वास्तुदोष से बचने के लिए अपनाएं कुछ खास टिप्स
अगर आप स्थानाभाव की वजह से रसोईघर को स्टोर अथवा भंडारण कक्ष के रूप में इस्तेमाल की योजना बना रहे हैं, तो ध्यान रखें ईशान व आग्नेय कोण के मध्य पूर्वी दीवार के पास के स्थान का उपयोग करें। चूल्हा या गैस आग्नेय कोण में ही रखें।
 - वास्तुदोष से बचने के लिए ध्यान रखें कि दरवाजे व खिड़कियों की संख्या विषम न होने पाएं। इनकी संख्या सम यानी 2, 4, 6, 8 आदि रखें।
 - घर में आंगन मध्य में ऊंचा तथा चारों ओर से नीचा होना चाहिए। यदि आपका आंगन वास्तु के अनुरूप न हो, तो उसे फौरन बताए गए तरीके से पूर्ण करवा लें। ध्यान रखें आंगन मध्य में नीचा व चारों ओर ऊंचा भूलकर भी न रखें।
 - कोई भूखंड उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर विस्तृत हो तथा भवन का निर्माण उत्तरी भाग में हुआ हो तथा भूखंड का दक्षिणी भाग खाली पड़ा हो तो वास्तु में यह स्थिति अत्यंत दोषपूर्ण होती है।
 - इस दोषपूर्ण स्थिति के चलते भूस्वामी को कष्टों तथा परेशानियों को झेलना पड़ता है। भूस्वामी को व्यापार में तथा कारोबार में हानि होती है। परिवार में तनाव का माहौल बना रहता है।
 - इस स्थिति में वास्तु दोष से बचने के लिए भवन के दक्षिण-पश्चिम कोण यानी नैऋत्य कोण में एक आउट हाउस को मुख्य भवन से ऊंचा बनवाएं और उसके फर्श को भी भवन के फर्श से ऊंचा रखें। आउट हाउस के दक्षिण या पश्चिम दिशा में कोई भी द्वार न रखें।
 - मुख्य द्वार के सामने अंदर की तरफ आईना लगाना गलत है। ऐसा करने पर घर के अंदर प्रवेश करने वाली ऊर्जा परावर्तित होकर द्वार से बाहर निकल जाती है।

- कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मुख्य द्वार के ठीक सामने अंदर कोई दीवार हो। पर फिर भी उस पर आईना न लगाएं और दीवार पर ऊपर से नीचे तक गहराई का आभास देने वाला कोई प्राकृतिक दृश्य चित्र लगाएं। यह जंगल में दूर-दूर तक दिखाई देने वाली सड़क का चित्र भी हो सकता है।
आरोग्य चाहिए तो घर के वास्तु पर ध्यान दें
'वास्तु' शब्द का अर्थ है- निवास करना। जिस भूमि पर मनुष्य निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। वास्तुशास्त्र में गृह निर्माण संबंधी विविध नियमों का प्रतिपादन किया गया है। उनका पालन करने से मनुष्य को अन्य कई प्रकार के लाभों के साथ-साथ आरोग्य लाभ भी होता है।
. गृह में जल स्थान- कुआं या भूमिगत टंकी पूर्व, पश्चिम, उत्तर अथवा ईशान दिशा में होनी चाहिए। जलाशय या ऊर्ध्व टंकी उत्तर या ईशान दिशा में होनी चाहिए.....।
 यदि घर के दक्षिण दिशा में कुआं हो तो अद्भुत रोग होता है। नैऋत्य दिशा में कुआं होने से आयु का क्षय होता है।
 . घर में कमरों की स्थिति- यदि एक कमरा पश्चिम और एक कमरा उत्तर में हो तो वह गृहस्वामी के लिए मृत्युदायक होता है। इसी तरह पूर्व और उत्तर दिशा में कमरा हो तो आयु का ह्रास होता है। पूर्व और दक्षिण दिशा में कमरा हो तो वातरोग होता है। यदि पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा में कमरा हो, पर दक्षिण में कमरा न हो तो सब प्रकार के रोग होते हैं।
 . गृह के आंतरिक कक्ष- स्नान घर 'पूर्व' में, रसोई 'आग्नेय' में, शयनकक्ष 'दक्षिण' में, शस्त्रागार, सूतिकागृह, गृह-सामग्री और बड़े भाई या पिता का कक्ष 'नैऋत्य' में, शौचालय 'नैऋत्य', 'वायव्य' या 'दक्षिण-नैऋत्य' में, भोजन करने का स्थान 'पश्चिम' में, अन्न-भंडार तथा पशुगृह 'वायव्य' में, पूजागृह 'उत्तर' या 'ईशान' में, जल रखने का स्थान 'उत्तर' या 'ईशान' में, धन का संग्रह 'उत्तर' में और नृत्यशाला 'पूर्व, पश्चिम, वायव्य या आग्नेय' में होनी चाहिए। घर का भारी सामान नैऋत्य दिशा में रखना चाहिए।
 .ईशान दिशा में पति-पत्नी शयन करें तो रोग होना अवश्यंभावी है। सदा पूर्व या दक्षिण की तरफ सिर करके सोना चाहिए। उत्तर या पश्चिम की तरफ सिर करके सोने से शरीर में रोग होते हैं तथा आयु क्षीण होती है।
 दिन में उत्तर की ओर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करना चाहिए। दिन में पूर्व की ओर तथा रात्रि में पश्चिम की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करने से आधा सीसी रोग होता है।
 दिन के दूसरे और तीसरे पहर यदि किसी वृक्ष, मंदिर आदि की छाया मकान पर पड़े तो वह रोग उत्पन्न करती है।
 एक दीवार से मिले हुए दो मकान यमराज के समान गृहस्वामी का नाश करने वाले होते हैं।
 किसी मार्ग या गली का अंतिम मकान कष्टदायी होता है।
 उन्नति में चार चांद लगाते हैं पेड़-पौधे
सकारात्मक ऊर्जा देते हैं पेड़-पौधे 
 पेड़-पौधे न सिर्फ घर को आकर्षक बनाते हैं बल्कि हमारे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं। कई ऐसे पौधे भी है जो आपकी उन्नति में चार चांद भी लगाते हैं।
 अपने घर में एक तुलसी का पौधा जरूर लगाएं। इसे उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्वी दिशा में लगाएं या फिर घर के सामने भी लगा सकते हैं।
 पेड़ को घर के मुख्य द्वार पर कभी भी न लगाएं।
 घर में नीम, चंदन, नींबू, आम, आंवला, अनार आदि के पेड़-पौधे अपने घर में लगाए जा सकते हैं।
 इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके आंगन में लगे पेड़ों की गिनती 2, 4, 6, 8... जैसे इवन नंबर्स में होनी चाहिए। ऑड नंबर्स मे नहीं।
 पेड़ों को घर की दक्षिण या पश्चिम दिशा में लगाएं। वैसे कायदे से पेड़ सिर्फ एक दिशा में ही न लग कर इन दोनों दिशाओं में लगे होने चाहिए।
 कांटों वाले पौधों को अपने घर में न ही लगाएं तो अच्छा है। गुलाब के अलावा अन्य कांटों वाले पौधे घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
                                                    वास्तु शास्त्र से पहचानें शुभ पेड़-पौधे

वास्तु : पेड़-पौधों के आधार पर करें भूमि का चयन

 जिस भूमि पर तुलसी के पौधे लगे हों वहां भवन निर्माण करना उत्तम है तुलसी का पौधा अपने चारों ओर का 50 मीटर तक का वातावरण शुद्ध रखता है, क्योंकि शास्त्रों में यह पौधा बहुत ही पवित्र एवं पूजनीय माना गया है।
भारतीय संस्कृति में वृक्षों का अपना महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आयुर्वेद के जनक महर्षि चरक ने भी  वातावरण की शुद्धता के लिए विशेष वृक्षों का महत्व बताया है। अंततोगत्वा भूमि पर उत्पन्न होने वाले वृक्षों के आधार पर भूमि का चयन किया जाता है।
कांटेदार वृक्ष घर के समीप होने से शत्रु भय होता है। दूध वाला वृक्ष घर के समीप होने से धन का नाश होता है। फल वाले वृक्ष घर के समीप होने से संतति का नाश होता है। इनके काष्ठ भी घर पर लगाना अशुभ हैं। कांटेदार आदि वृक्षों को काटकर उनकी जगह अशोक, पुन्नाग व शमी रोपे जाएं तो उपर्युक्त दोष नहीं लगता है।
* पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा काँटेदार वृक्ष, पीपल, अगस्त, इमली ये सभी घर के समीप निंदित  कहे गए हैं।
* भवन निर्माण के पहले यह भी देख लेना चाहिए कि भूमि पर वृक्ष, लता, पौधे, झाड़ी, घास, कांटेदार वृक्ष  आदि नहीं हों।
 *जिस भूमि पर पपीता, आंवला, अमरूद, अनार, पलाश आदि के वृक्ष बहुत हों वह भूमि, वास्तुशास्त्र में बहुत श्रेष्ठ बताई गई है।
* जिन वृक्षों पर फूल आते रहते हैं और लता एवं वनस्पतियां सरलता से वृद्धि करती हैं इस प्रकार की  भूमि भी वास्तुशास्त्र में उत्तम बताई गई है।
* जिस भूमि पर कंटीले वृक्ष, सूखी घास, बैर आदि वृक्ष उत्पन्न होते हैं। वह भूमि वास्तु में निषेध बताई  गई है।
* जो व्यक्ति अपने भवन में सुखी रहना चाहते हैं उन्हें कभी भी उस भूमि पर निर्माण नहीं करना चाहिए,  जहां पीपल या बड़ का पेड़ हो।
* सीताफल के वृक्ष वाले स्थान पर भी या उसके आसपास भी भवन नहीं बनाना चाहिए। इसे भी  वास्तुशास्त्र ने उचित नहीं माना है, क्योंकि सीताफल के वृक्ष पर हमेशा जहरीले जीव-जंतु का वास होता  है।
* जिस भूमि पर तुलसी के पौधे लगे हों वहां भवन निर्माण करना उत्तम है तुलसी का पौधा अपने चारों  ओर का 50 मीटर तक का वातावरण शुद्ध रखता है, क्योंकि शास्त्रों में यह पौधा बहुत ही पवित्र एवं  पूजनीय माना गया है।
* भवन के निकट वृक्ष कम से कम दूरी पर होना चाहिए ताकि दोपहर की छाया भवन पर न पड़े।
सिर्फ अशुभ नहीं, शुभ भी होता है दक्षिण दिशा का भवन
                                        दक्षिण दिशा के शुभाशुभ प्रभाव जानिए

जिस तरह मनुष्य की पांच ज्ञानेंद्रियां मानी गई हैं, उसी प्रकार वास्तु की भी पांच ज्ञानेन्द्रिय होती हैं। ये इस प्रकार हैं- हवा, वातावरण, जल, भूमि और वृक्ष। इनके संतुलन द्वारा शुभ-वास्तु का जन्म होता है। वास्तु में दरवाजे, खिड़की, शयन कक्ष, सभागृह और रसोईगृह उचित दिशा में न हों तो कुछेक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
वास्तु के कई भ्रमों को दूर करना चाहिए। इनमें एक है दक्षिण दिशा का मकान। दक्षिण दिशा का मकान हो तो अशुभ होने की आशंका रहती (मानी जाती) है। परंतु यह भ्रम है।

भारत के शहरों के इतिहास देखें तो दक्षिण दिशा ने इतनी प्रगति की है, जितनी अन्य दिशाओं ने नहीं की। संपन्नता दक्षिण दिशा में भी प्राप्त होती है। रावण की लंका और भारत के स्वर्ण भंडार इसके उदाहरण हैं।
गृह से संबंधित कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे घर के अंदर उत्तर-पूर्व में टॉयलेट (शौचालय) नहीं होना चाहिए। इससे शारीरिक कष्ट होने या बढ़ने की संभावना मानी जाती है। रसोई कक्ष पूर्व-दक्षिण (आग्नेय) कोण में होना चाहिए।
इसी तरह बेडरूम (शयन कक्ष) दक्षिण-पश्चिम में होना अति उत्तम माना जाता है। खिड़कियां उत्तर या पूर्व में ही हों। दरवाजे के लिए पूर्व या उत्तर दिशा सर्वश्रेष्ठ बताई जाती है। स्त्री के नाम से मकान हो तो ऐसे मकान का द्वार दक्षिण दिशा की ओर हो तो सर्वोत्तम माना जाता है, जिसमें तिजोरी का दरवाजा भी दक्षिण दिशा की तरफ हो तो अति उत्तम माना जाता है।
क्यों विशेष है उत्तर दिशा
वास्तु शास्त्र घर को व्यवस्थित रखने की कला का नाम है। इसके सिद्धांत, नियम और फार्मूले किसी मंत्र से कम शक्तिशाली नहीं हैं।
आप वास्तु के अनमोल मंत्र अपनाइए और सदा सुखी रहिए।
- उत्तर दिशा जल तत्व की प्रतीक है। इसके स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में घर की स्त्रियों के लिए रहने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।
- उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र अर्थात्‌ ईशान कोण जल का प्रतीक है। इसके अधिपति यम देवता हैं। भवन का यह भाग ब्राह्मणों, बालकों तथा अतिथियों के लिए शुभ होता है।
- उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र यानी वायव्य कोण वायु तत्व प्रधान है। इसके अधिपति वायुदेव हैं। यह सर्वेंट हाउस के लिए तथा स्थाई तौर पर निवास करने वालों के लिए उपयुक्त स्थान हैं।
- उत्तर दिशा में निकास नालियां हों तो यह स्थिति भू-स्वामी के लिए बहुत ही शुभ तथा राज्य लाभ देने वाली होती है।
- ईशान; उत्तर-पूर्व कोण में जल प्रवाह की नालियां भू-स्वामी के लिए श्रेष्ठ तथा कल्याणकारी होती हैं। गृह स्वामी को धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है।
जीवन की खुशियों के लिए अपनाएं वास्तु टिप्स
हम सभी अपनी जिंदगी में सुख और समृद्धि चाहते हैं लेकिन रोजमर्रा में ऐसी गलतियां करते हैं जो वास्तु के अनुसार सही नहीं होती। आइए जानते हैं कुछ आसान टिप्स जिनसे घर में खुशियों का निवास बना रहे- 
वास्तु टिप्स :
* रात को कपड़े बाहर न सुखाएं।
* बंद घडियां घर में अशुभ होती है।
* झाडू-पोंछा और कूड़ादान हमेशा छुपा कर रखें।
* रसोई घर में पानी और चूल्हा पास ना रखें।
* मुख्य द्वार के सामने सीढ़ी नहीं होनी चाहिए।
* पति-पत्नी हमेशा एक ही तकिए पर सोएं।
* लंबे गलियारे में दर्पण जरूर लगाएं।
* सूखे फूल घर में कभी ना रखें।
* खाली दीवार की तरफ मुंह करके ना बैठें।
* दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्फटिक का झूमर टांगें।

                                 बच्चों की उन्नति चाहते हैं तो आजमाएं यह वास्तु टिप्स

वास्तु अनुरूप कैसे सजाएं बच्चों का रूम

घर में बच्चों का कमरा पूर्व, उत्तर, पश्चिम या वायव्य में हो सकता है। दक्षिण, नैऋत्य या आग्नेय में बच्चों का कमरा नहीं होना चाहिए। बच्चों के कमरे की सजावट पूर्ण रूप से उनके अनुकूल होनी आवश्यक है तभी वे निरोग रहते हुए उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर होंगे। सर्वप्रथम बच्चों के कमरे का रंग-रोगन पूर्ण रूप से उनके शुभ रंग के अनुसार होना चाहिए।

गृह स्वामी को अपने घर के संपूर्ण वास्तु-विचार के साथ अपने बच्चों के कमरे के वास्तु का भी ध्यान रखना चाहिए। बच्चों की उन्नति के लिए उनका वास्तु अनुकूल ग्रह अथवा कमरे में निवास करना आवश्यक है।
घर में बच्चों का कमरा पूर्व, उत्तर, पश्चिम या वायव्य में हो सकता है। दक्षिण, नैऋत्य या आग्नेय में बच्चों के कमरे की सजावट पूर्ण रूप से उनके अनुकूल होनी आवश्यक है तभी वे निरोग रहते हुए उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर होंगे।
सर्वप्रथम बच्चों के कमरे का रंग-रोगन पूर्णरूप से उनके शुभ रंग के अनुसार होना चाहिए। आपके बच्चों की जन्मपत्रिका में लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश ग्रहों में से जो सर्वाधिक रूप से बली हो अथवा बच्चे की राशीश ग्रह के अनुसार उसके कमरे का रंग तथा पर्दे होने चाहिए।
यदि बच्चे एक या उससे अधिक हों तो जो बच्चा बड़ा हो तथा महत्वपूर्ण विद्यार्जन कर रहा हो, उस अनुसार दीवारों का रंग होना चाहिए। यदि दोनों हमउम्र हों तो उनके कमरे में दो भिन्न-भिन्न शुभ रंगों का प्रयोग किया जा सकता है।
पर्दों का रंग दीवार के रंग से थोड़ा गहरा होना चाहिए। बच्चों का पलंग अधिक ऊंचा नहीं होना चाहिए तथा वह इस तरह से रखा जाए कि बच्चों का सिरहाना पूर्व दिशा की ओर हो तथा पैर पश्चिम की ओर। बिस्तर के उत्तर दिशा की ओर टेबल एवं कुर्सी होनी चाहिए। पढ़ते समय बच्चे का मुंह पूर्व दिशा की ओर तथा पीठ पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए। यदि कम्प्यूटर भी बच्चे के कमरे में रखना हो तो पलंग से दक्षिण दिशा की ओर आग्नेय कोण में कम्प्यूटर रखा जा सकता है।
यदि बच्चे के कमरे का दरवाजा ही पूर्व दिशा में हो तो पलंग दक्षिण से उत्तर की ओर होना चाहिए। सिरहाना दक्षिण में तथा पैर उत्तर में। ऐसी स्‍थिति में कम्प्यूटर टेबल के पास ही पूर्व की ओर स्टडी टेबल स्थित होनी चाहिए। नैऋत्य कोण में बच्चों की पुस्तकों की रैक तथा उनके कपड़ों वाली अलमारी होनी चाहिए।
यदि कमरे से ही जुड़े हुए स्नानागार तथा शौचालय रखना हो तो पश्चिम अथवा वायव्य दिशा में हो सकता है। बच्चों के कमरे में पर्याप्त रोशनी आनी चाहिए। व्यवस्था ऐसी हो कि दिन में पढ़ते समय उन्हें कृत्रिम रोशनी की आवश्यकता ही न हो। जहां तक संभव हो सके, बच्चों के कमरे की उत्तर दिशा बिलकुल खाली रखना चाहिए।
उनके किताबों की रैक नैऋत्य कोण में स्थित हो सकती है। खिड़की, एसी तथा कूलर उत्तर दिशा की ओर हो। बच्चों के कमरे में स्‍थित चित्र एवं पेंटिंग्स की स्‍थिति उनके विचारों को प्रभावित करती है इसलिए हिंसात्मक, फूहड़ एवं भड़काऊ पेंटिंग्स एवं चि‍त्र बच्चों के कमरे में कभी नहीं होना चाहिए।
महापुरुषों के चित्र, पालतू जानवरों के चित्र, प्राकृतिक सौंदर्य वाले चित्र तथा पेंटिंग्स बच्चों के कमरे में हो सकती हैं। भगवान गणेश तथा सरस्वतीजी का चित्र कमरे के पूर्वी भाग की ओर होना चाहिए। इन दोनों की देवी-देवताओं को बुद्धिदाता माना जाता है अत: सौम्य मुद्रा में श्री गणेश तथा सरस्वती की पेंटिंग या चि‍त्र बच्चों के कमरे में अवश्य लगाएं।
आपका बच्चा जिस क्षेत्र में करियर बनाने का सपना देख रहा है, उस करियर में उच्च सफलता प्राप्त व्यक्तियों के चित्र अथवा पेंटिंग्स भी आप अपने बच्चों के कमरे में लगा सकते हैं। यदि बच्चा छोटा हो, तो कार्टून आदि की पेंटिंग्स लगाई जा सकती है।
बच्चों के कमरे में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि घर में होने वाला शोरगुल उन्हें बिलकुल बाधित न करे अत: बच्चों के कमरे से घर की तरफ कोई खिड़की या झरोखा खुला हुआ नहीं होना चाहिए।
बच्चों की श्रेष्ठ उन्नति के लिए उनके कमरे का वास्तु के अनुकूल होना आवश्यक है। वास्तु अनुरूप परिवर्तन से आपके बच्चे के मानसिक विकास एवं उसकी ग्रहण क्षमता में शुभ परिवर्तन नजर आएगा। इस वास्तु परिवर्तन के पश्चात बच्चा मन लगाकर पढ़ेगा तथा उसका स्वास्थ्य भी अनुकूल रहेगा।
रोचक और सरल वास्तु मंत्र, आजमा कर देखें
* भवन निर्माण में दरवाजे और खिड़कियां सम संख्या में हों तथा सीढ़ियां विषम संख्या में हों।
* टॉयलेट और किचन एक पंक्ति (कतार) में या आमने-सामने होना दोषकारक है।
* घर में गणेशजी की एक से अधिक मूर्ति हो तो कोई फर्क नहीं, परंतु पूजा एक ही गणेशजी की हो।
*  घर में गणपति की मूर्ति, रंगोली, स्वस्तिक या ॐ का चिह्न बुरी आत्माओं के प्रभाव को नियंत्रित करता है।
* घर के बाहर या अंदर आशीर्वाद मुद्रा में देवी-देवता की मूर्ति अथवा चित्र लगाएं। ध्यान रहे, उनका मुंह भवन के बाहर की तरफ हो।
* घर के ड्राइंगरूम में मोर, बंदर, शेर, गाय, मृग आदि के चि‍त्र या मूर्ति रूप में किसी एक का जोड़ा रखें जिसका मुंह एक-दूसरे की तरफ हो तथा मुंह घर के अंदर हो, शुभ रहेगा।
* दक्षिण दिशा में घोड़ा (अश्व) रखना सर्वोत्तम है।
* असली स्फटिक बाल, श्रीयंत्र, पिरामिड या कटिंग बाल को आप कहीं भी रख सकते हैं। (श्रीयं‍त्र को केवल घर के मंदिर में रखें।)
* धन-समृद्धि के लिए धन की पेटी (कैश बॉक्स) में ‍तीन सिक्के रखें, जो भाग्य की अभिवृद्धि में सहायक होंगे।
* घोड़े की नाल पश्चिमी देशों तथा हमारे देश में भी बहुत भाग्यशाली और शुभ मानी जाती है। अपनी सुरक्षा और सौभाग्य के लिए इसे अपने घर के मुख्य द्वार के ऊपर चौखट के बीच में लगा सकते हैं।
*बीम के नीचे बिंदु चिप्स लगाकर बीम के दोष को दूर कर सकते हैं।
* संपत्ति तथा सफलता के लिए अपने बैठक कक्ष में पिरामिड को उत्तर-पूर्व में रखें।
* प्रसिद्धि के लिए घर के दक्षिण क्षेत्र में लाल रंग का उपयोग करें एवं उसे लाल रंग की वस्तुओं से सजाएं। इससे परिवार में रहने वाले लोगों को खून से संबंधित बीमारियों से निजात मिल सकती है, किंतु चि‍कि‍त्सीय भावना की उपेक्षा कष्टदायी हो सकती है।
* मुख्य द्वार पर कोई अवरोध (खंबा, कोना, पेड़) आदि हो तो उसके दोष निवारण हेतु बागुआ मिरर लगाएं।
* विवादों से संबंधित कागजात कभी भी आग्नेय दिशा में न रखें। ऐसे कागजात ईशान या वायव्य दिशा में रखें।
* पश्चिम-दक्षिण, उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम दिशाओं को अन्य दिशाओं के मुकाबले ज्यादा से ज्यादा ढंका व भरा हुआ होना चाहिए तथा थोड़ा ऊंचा भी होना चाहिए।
* घर में कांटेदार पौधे, युद्ध के दृश्य, सूखे पेड़, जमीन, आंसू बहाते प्राणी, खूंखार जानवर आदि के चित्र न लगाएं।
* जिन लोगों का चूल्हा ईशान में हो और परिस्थितिजन्य हटाया नहीं जा सके, तो ऐसी विषम परिस्थिति में किचन में लाल बल्ब न जलाएं।
* बच्चों के कमरों में सुंदर प्राकृतिक दृश्य यथा समृद्ध हरे-भरे पहाड़, जल विहार तथा महापुरुषों के चित्र लगाएं। नाइट लैम्प के रूप में हरे या नीले बल्ब का प्रयोग सुखद रहेगा।
* उत्तम भाग्य तथा पारिवारिक समृद्धि के लिए सुंदर रंगीन पर्दे, दीवार व छतों पर हल्के और मन लुभावने रंगों का प्रयोग करें।
* कॉर्नर, बीम आदि की नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए पेड़-पौधों, सीनरी व लाइट्स का प्रयोग पारिवारिक सुख-सौहार्द के लिए अनुकूलता प्रदान करेगा।
* व्यावसायिक कार्यालयों में दक्षिण दिशा में संस्थान के मालिक की फोटो लगाएं।
* पवन घंटियां घर में सौभाग्य बढ़ाने का अद्भुत स्रोत हैं। पवन घंटियां बैठक तथा घर में स्थापित मंदिर के दरवाजे पर लटकाने से शुभ्रता प्रदान करती है।
* मधुर संबंधों के लिए प्रसन्नचित मुद्रा में संयुक्त परिवार का फोटो लगाएं।
* घर में नमक मिले पानी से पोंछा लगाएं। यह घर में स्‍थित नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होगा।
* पूर्वजों के चित्र उत्तर-पश्चिम में रखें, तो ज्यादा अच्‍छा होगा।
* अलमारी या कपड़ों की अलमारी दक्षिण दिशा को छोड़कर किसी भी दिशा में खुलनी चाहिए। दक्षिण की ओर खुलने वाली अलमारी में बहुमूल्य सामान या महत्वपूर्ण कागजात नहीं रखना चाहिए।
* उत्तर-पूर्व में रसोईघर नहीं होना चाहिए।
*पिरामिड का उपयोग घर में कहीं भी नकारात्मक शक्ति को हटाने के लिए कर सकते हैं।
* बत्तख या कबूतर के जोड़े की तस्वीर को शयनकक्ष (बेडरूम) में रखने से संबंधों में मधुरता आती है।
 * भवन निर्माण के समय ध्यान रखें कि दक्षिण-पश्चिम की दीवारें कुछ ऊंची होनी चाहिए, भले वे 1 इंच हों, परिवार की सुख-समृद्धि के लिए सुखदायी रहेगी।
                                           जा‍निए, किस दिशा में सोने से बढ़ता है धन

किस दिशा में सोते हैं आप
* जानिए, अपार धन चाहिए तो किस दिशा में सोएं
नींद से हमारा गहरा रिश्ता है। जब हम सोते हैं तब हमारा अपने आप से रिश्ता कायम होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस दिशा विशेष में सिर रखकर सोने से अपार धन और आरोग्य की वृद्धि होती है।
सदैव पूर्व या दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए।
पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।
दक्षिण की ओर सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि होती है।
पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिंता होती है।
उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि तथा मृत्यु होती है अर्थात आयु क्षीण होती है।
आपके घर का वास्तुदोष दूर करेंगे श्रीगणेश
यदि घर के मुख्य द्वार पर श्रीगणेश की प्रतिमा या चित्र लगाया जाए तो घर के सभी वास्तु दोषों का शमन होता है।
इसके लिए यह भी ध्यान रखना होगा कि जहां पर श्रीगणेश का चित्र लगाया गया है, उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र इस प्रकार लगाए कि दोनों गणेशजी की एक-दूसरे से पीठ मिली रहे।
इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है। इस तरह आप बिना किसी तोड़-फोड़ के श्रीगणेश के पूजन से घर के वास्तुदोष को ठीक कर सकते हैं।
एक दूसरे उपाय के अनुसार आपके मकान या फ्लैट के जिस भाग में वास्तु दोष है, वहां सिंदूर में घी मिलाकर उस स्थान पर स्वास्तिक बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है और जीवन में खुशियों का संचार होता है।
                                         गणेशजी कैसे दूर करते हैं वास्तुदोष

वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तुदेवता की संतुष्टि गणेशजी की आराधना के बिना अकल्पनीय है।
गणपतिजी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। नियमित गणेशजी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है। यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर दोनों गणेशजी की पीठ मिली रहे इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है।

भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिन्दूर से स्वस्तिक दीवार पर बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है। घर या कार्यस्थल के किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा अथवा चित्र लगाए जा सकते हैं। किन्तु यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुँह दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में नहीं होना चाहिए। सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों के लिए सफेद रंग के विनायक की मूर्ति, चित्र लगाना चाहिए।
सर्व मंगल की कामना करने वालों के लिए सिन्दूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है। विघ्नहर्ता की मूर्ति अथवा चित्र में उनके बाएं हाथ की और सूंड घुमी हुई हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए। दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी हठी होते हैं तथाउनकी साधना-आराधना कठिन होती है। वे देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं। मंगल मूर्ति को मोदक एवं उनका वाहन मूषक अतिप्रिय है। अतः चित्र लगाते समय ध्यान रखें कि चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा अवश्य होना चाहिए।
घर में बैठे हुए गणेशजी तथा कार्यस्थल पर खड़े गणपतिजी का चित्र लगाना चाहिए, किन्तु यह ध्यान रखें कि खड़े गणेशजी के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों। इससे कार्य में स्थिरता आने की संभावना रहती है। भवन के ब्रह्म स्थान अर्थात केंद्र में, ईशान कोण एवं पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति अथवा चित्र लगाना शुभ रहता है। किन्तु टॉयलेट अथवा ऐसे स्थान पर गणेशजी का चित्र नहीं लगाना चाहिए जहां लोगों को थूकने आदि से रोकना हो। यह गणेशजी के चित्र का अपमान होगा।

                                          वास्तुदोष भी दूर करते हैं भगवान श्री गणेश

सुख, शांति और समृद्धि के लिए गणेशजी को रखें घर में
* बिना तोड़-फोड़ वास्तुदोष दूर करना है तो पूजें श्री गणेश को
वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ।
नि‍र्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
कई वास्तुदोषों का निवारण भगवान गणपति जी की पूजा से होता है। वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी।
यह मानव कल्याण के लिए बनाया गया था इसलिए इनकी अनदेखी करने पर घर के सदस्यों को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि भी उठानी पड़ती है अत: वास्तु देवता की संतुष्टि के लिए भगवान गणेश को पूजना बेहतर है।
श्री गणेश की आराधना के बिना वास्तु देवता को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। बिना तोड़-फोड़ अगर वास्तु दोष को दूर करना चाहते हैं तो इन्हें आजमाइए।
सुख, समृद्धि व प्रगति :-
यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो हो सके तो दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर गणेशजी की प्रतिमा इस प्रकार लगाएं कि दोनों गणेशजी की पीठ मिलती रहे।
इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा का चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है। भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो, उस स्‍थान पर घी मिश्रित सिन्दूर से स्वस्तिक दीवार पर बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।
दक्षिण व नैऋत्य कोण और श्री गणेश :-
घर या कार्यस्थल के किसी भी भाग में वक्रतुंड की प्रतिमा अथवा चित्र लगाए जा सकते हैं, किंतु प्रतिमा लगाते समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में नहीं हो। इसका विपरीत प्रभाव होता है।
घर में बैठे हुए गणेशजी तथा कार्यस्थल पर खड़े गणेशजी का चित्र लगाना चाहिए। किंतु यह ध्यान रखें कि खड़े गणेशजी के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों, इससे कार्य में स्थिरता आने की संभावना रहती है।
भवन के ब्रह्म स्थान अर्थात केंद्र में, ईशान कोण एवं पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति अथवा चि‍त्र लगाना शुभ रहता है। गणेशजी का चित्र नहीं लगाना चाहिए, जहां लोगों को थूकने आदि से रोकना हो। सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों के लिए सफेद रंग के विनायक की मूर्ति, चित्र लगाना चाहिए।
हर अवसर पर शुभ सिंदूरी गणेश :-
सर्व मंगल की कामना करने वालों के लिए सिंदूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है। विघ्नहर्ता की मूर्ति अथवा चित्र में उनके बाएं हाथ की ओर सूंड घुमी हुई हो, इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी हठी होते हैं तथा उनकी साधना-आराधना कठिन होती है।
जरूरी है लड्डू और चूहा :-
मंगलमूर्ति भगवान को मोदक एवं उनका वाहन मूषक अतिप्रिय है अत: घर में चित्र लगाते समय ध्यान रखें कि चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा अवश्य होना चाहिए।
इस तरह आप भी बिना तोड़-फोड़ के गणपति पूजन द्वारा वास्तुदोष को दूर कर सकते हैं।

                                       वास्तु शास्त्र के अनुसार कैसे हो भगवान गणेश

वास्तु में वर्णित है हर कामना के खास गणपति
वास्तु में गणपति की मूर्ति एक, दो, तीन, चार और पांच सिरों वाली पाई जाती है। इसी तरह गणपति के 3 दांत पाए जाते हैं। सामान्यत: 2 आंखें पाई जाती हैं, किंतु तंत्र मार्ग संबंधी मूर्तियों में तीसरा नेत्र भी देखा गया है।
भगवान गणेश की मूर्तियां 2, 4, 8 और 16 भुजाओं वाली भी पाई जाती हैं। 14 प्रकार की महाविद्याओं के आधार पर 12 प्रकार की गणपति प्रतिमाओं के निर्माण से वास्तु जगत में तहलका मच गया है।
* संतान गणपति- भगवान गणपति के 1008 नामों में से संतान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए जिनके घर में संतान नहीं हो रही हो। वे लोग संतान गणपति की विशिष्ट मंत्र पूरित प्रतिमा द्वार पर लगाएं जिसका प्रतिफल सकारात्मक होता है।
* विघ्नहर्ता गणपति- विघ्नहर्ता भगवान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए, जिस घर में कलह, विघ्न, अशांति, क्लेश, तनाव, मानसिक संताप आदि दुर्गुण होते हैं। पति-पत्नी में मनमुटाव, बच्चों में अशांति का दोष पाया जाता है। ऐसे घर में प्रवेश द्वार पर मूर्ति स्थापित करनी चाहिए।
* विद्या प्रदायक गणपति- बच्चों में पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी पैदा करने के लिए गृहस्वामी को विद्या प्रदायक गणपति अपने घर के प्रवेश द्वार पर स्थापित करना चाहिए।
* विवाह विनायक- गणपति के इस स्वरूप का आह्वान उन घरों में विधि-विधानपूर्वक होता है, जिन घरों में बच्चों के विवाह जल्द तय नहीं होते।
* चिंतानाशक गणपति- जिन घरों में तनाव व चिंता बनी रहती है, ऐसे घरों में चिंतानाशक गणपति की प्रतिमा को 'चिंतामणि चर्वणलालसाय नम:' जैसे मंत्रों का सम्पुट कराकर स्थापित करना चाहिए।
* धनदायक गणपति- आज हर व्यक्ति दौलतमंद होना चाहता है इसलिए प्राय: सभी घरों में गणपति के इस स्वरूप वाली प्रतिमा को मंत्रों से सम्पुट करके स्थापित किया जाता है ताकि उन घरों में दरिद्रता का लोप हो, सुख-समृद्धि व शांति का वातावरण कायम हो सके।
* सिद्धिनायक गणपति- कार्य में सफलता व साधनों की पूर्ति के लिए सिद्धिनायक गणपति को घर में लाना चाहिए।
* सोपारी गण‍पति- आध्यात्मिक ज्ञानार्जन हेतु सोपारी गण‍पति की आराधना करनी चाहिए।
* शत्रुहंता गण‍पति- शत्रुओं का नाश करने के लिए शत्रुहंता गणपति की आराधना करना चाहिए।
* आनंददायक गणपति- परिवार में आनंद, खुशी, उत्साह व सुख के लिए आनंददायक गणपति की प्रतिमा को शुभ मुहूर्त में घर में स्‍थापित करना चाहिए।
* विजय सिद्धि गणपति- मुकदमे में विजय, शत्रु का नाश करने, पड़ोसी को शांत करने के उद्देश्य से लोग अपने घरों में 'विजय स्थिराय नम:' जैसे मंत्र वाले बाबा गणपति की प्रतिमा के इस स्वरूप को स्था‍पित करते हैं।
* ऋणमोचन गणपति- कोई पुराना ऋण, जिसे चुकता करने की स्थिति में न हो, तो ऋण मोचन गणपति घर में लगाना चाहिए।
* रोगनाशक गणपति- कोई पुराना रोग हो, जो दवा से ठीक न होता है, उन घरों में रोगनाशक गणपति की आराधना करनी चाहिए।
* नेतृत्व शक्ति विकासक गण‍पति- राजनीतिक परिवारों में उच्च पद प्रतिष्ठा के लिए लोग गणपति के इस स्वरूप की आराधना प्राय: इन मंत्रों से करते हैं- 'गणध्याक्षाय नम:, गणनायकाय नम: प्रथम पूजिताय नम:।'

भगवान श्री गणेश

शास्त्रों के अनुसार प्रथम पूज्य श्री गणेश को परिवार का देवता माना गया है। परिवार की किसी भी प्रकार की परेशानी के लिए गणेशजी की आराधना श्रेष्ठ उपाय है। वहीं वास्तु में भी श्री गणेश की प्रतिमा को वास्तुदोष दूर करने का अचूक उपाय बताया गया है।
वास्तु के अनुसार घर में विघ्न विनाशक श्री गणेश की प्रतिमा रखना बहुत शुभ माना जाता है। जहां गणेशजी की प्रतिमा रहती है उस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का वास्तुदोष सक्रीय नहीं हो पाता। साथ ही घर के आसपास भी नकारात्मक ऊर्जा भी प्रभाव नहीं दिखा पाती। इनकी प्रतिमा के शुभ प्रभाव से परिवार के सभी सदस्यों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
घर में श्रीगणेश की प्रतिमा कहां रखनी चाहिए? इस संबंध में वास्तु के अनुसार इनकी मूर्ति ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में लगानी चाहिए। नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में श्रीगणेश की मूर्ति शुभ प्रभाव नहीं देती।
घर के पूजन स्थल पर गणेशजी की बाएं हाथ की ओर सूंड वाली मूर्ति बहुत शुभ मानी जाती है। घर में जहां वास्तु दोष हो वहां सिंदूर से स्वस्तिक का चिन्ह बनाएं। साथ घर के मुख्य द्वार गणेशजी की प्रतिमा या उनका प्रतिक चिन्ह स्वस्तिक बनाएं।
घर की सजावट बढ़ाने के लिए दीवारों पर फोटो लगाए जाते हैं। इनसे घर की सुंदरता तो बढ़ती है साथ ही मन को सुकून भी मिलता है लेकिन दीवारों पर कैसे फोटो लगाए जाने चाहिए? इस संबंध में वास्तु में कई आवश्यक बिंदू बताए गए हैं।
                                       सरल और उपयोगी वास्तु टिप्स, अवश्य पढ़ें

* ईशान कोण यानी भवन के उत्तर-पूर्वी हिस्से वाला कॉर्नर पूजास्थल होकर पवित्रता का प्रतीक है इसलिए यहां झाड़ू-पोंछा, कूड़ादान नहीं रखना चाहिए।
* प्रात:काल नाश्ते से पूर्व घर में झाड़ू अवश्य लगानी चाहिए।
* संध्या समय जब दोनों समय मिलते हैं, घर में झाड़ू-पोंछे का काम नहीं करना चाहिए।
* घर में जूतों का स्थान प्रवेश द्वार के दाहिने तरफ न रखें।
* घर में टूटे दर्पण, टूटी टांग का पाटा तथा किसी बंद मशीन का रखा होना सुख-समृद्धि की दृष्टि से अशुभकारक है।
* घर के अग्रभाग के दाएं ओर कमरे में जेवर, गहने, सोने-चांदी का सामान, लक्जरी आर्टिकल्स रखने से खुशियां प्राप्त होती हैं।
* ड्राइंग-हॉल को अपने बेडरूम की तरह उपयोग में लेने पर पति, पत्नी को प्यार करता है और दोस्तों से अच्छे संबंध रखता है।
* अनाज वाले कमरे में गहने, पैसे, कपड़े रखने वाला गृहस्वामी पैसा उधार देने का काम करता है या भौतिक सुख-सुविधा की चीजें या बड़े सौदों से अर्जन करता है।
* घर के मुख्य द्वार पर शुभ चिह्न अंकित करना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि बनी रहती है।
* घर में पूजास्थल में एक जटा वाला नारियल रखना चाहिए।
* घर में सजावट में हाथी, ऊंट को सजावटी खिलौने के रूप में उपयोग शुभ होता है।
* ऐसे शयनकक्ष जिनमें दंपति सोते हैं, वहां हंसों के जोड़े अथवा सारस के जोड़े के चित्र लगाना अति शुभ माना गया है। ये चित्र शयनकर्ताओं के सामने रहें, इस तरह लगाना चाहिए।
* घर के ईशान कोण पर कूड़ा-करकट भी इकट्ठा न होने दें।
* घर में देवस्थल पर अस्त्र-शस्त्रों को रखना अशुभ है।
* घर में तलघर में परिवार के किसी भी सदस्यों के फोटो न लगाएं तथा वहां भगवान और देवी-देवताओं की तस्वीरें या मूर्तियां भी न रखें।
* तीन व्यक्तियों का एक सीध में एकाकी फोटो हो, तो उसे घर में नहीं रखें और न ही ऐसे फोटो को कभी भी दीवार पर टांगें।
                                            सरल वास्तु टिप्स 1 : क्या करें, क्या न करें

- स्फटिक के शिवलिंग की पूजा करें
भवन निर्माण या वास्तु दोषों से मुक्ति हेतु कुछ वैज्ञानिक प्रयासों को अंजाम देकर परिवार में सुख, शांति और व्यापारिक संस्थानों को श्रीसमृद्धि से युक्त बनाया जा सकता है। वास्तु टिप्स का लाभ उठा कर अपने बौद्धिक साहस का परिचय दीजिए। चमत्कारों का सूर्य आपको आभायुक्त बना देगा।
* भवन निर्माण में दरवाजे और खिड़कियां सम संख्या में हों तथा सीढ़ियां विषम संख्या में हों।
* टॉयलेट और किचन एक पंक्ति (कतार) में या आमने-सामने होना दोषकारक है।
* घर में गणेशजी की एक से अधिक मूर्ति हो तो कोई फर्क नहीं, परंतु पूजा एक ही गणेशजी की हो। घर में गणपति की मूर्ति, रंगोली, स्वस्तिक या ॐ का चिह्न बुरी आत्माओं के प्रभाव को नियंत्रित करता है।
* स्फटिक के शिवलिंग की पूजा करें। स्फटिक असली हो तो प्रभाव में वृद्धि होगी।
* घर के बाहर या अंदर आशीर्वाद मुद्रा में देवी-देवता की मूर्ति अथवा चित्र लगाएं। ध्यान रहे, उनका मुंह भवन के बाहर की तरफ हो।
* घर के ड्राइंगरूम में मोर, बंदर, शेर, गाय, मृग आदि के चि‍त्र या मूर्ति रूप में किसी एक का जोड़ा रखें जिसका मुंह एक-दूसरे की तरफ हो तथा मुंह घर के अंदर हो, शुभ रहेगा।
* दक्षिण दिशा में घोड़ा (अश्व) रखना सर्वोत्तम है।
* असली स्फटिक बॉल, श्रीयंत्र, पिरामिड या कटिंग बॉल को आप कहीं भी रख सकते हैं। (श्रीयं‍त्र को केवल घर के मंदिर में रखें।)
                                              सरल वास्तु टिप्स 2 : क्या करें, क्या न करें

- धन की पेटी (कैश बॉक्स) में तीन सिक्के रखें
भवन निर्माण या वास्तु दोषों से मुक्ति हेतु कुछ वैज्ञानिक प्रयासों को अंजाम देकर परिवार में सुख, शांति और व्यापारिक संस्थानों को श्रीसमृद्धि से युक्त बनाया जा सकता है। वास्तु टिप्स का लाभ उठा कर अपने बौद्धिक साहस का परिचय दीजिए। चमत्कारों का सूर्य आपको आभायुक्त बना देगा।
* धन-समृद्धि के लिए धन की पेटी (कैश बॉक्स) में तीन सिक्के रखें, जो भाग्य की अभिवृद्धि में सहायक होंगे।
* घोड़े की नाल पश्चिमी देशों तथा हमारे देश में भी बहुत भाग्यशाली और शुभ मानी जाती है। अपनी सुरक्षा और सौभाग्य के लिए इसे अपने घर के मुख्य द्वार के ऊपर चौखट के बीच में लगा सकते हैं।
* बीम के नीचे बिंदु चिप्स लगाकर बीम के दोष को दूर कर सकते हैं।
* संपत्ति तथा सफलता के लिए अपने बैठक कक्ष में पिरामिड को उत्तर-पूर्व में रखें।
* प्रसिद्धि के लिए घर के दक्षिण क्षेत्र में लाल रंग का उपयोग करें एवं उसे लाल रंग की वस्तुओं से सजाएं। इससे परिवार में रहने वाले लोगों को खून से संबंधित बीमारियों से निजात मिल सकती है, किंतु चि‍कि‍त्सीय भावना की उपेक्षा कष्टदायी हो सकती है।
* मुख्य द्वार पर कोई अवरोध (खंबा, कोना, पेड़) आदि हो तो उसके दोष निवारण हेतु बागुआ मिरर लगाएं।
* विवादों से संबंधित कागजात कभी भी आग्नेय दिशा में न रखें। ऐसे कागजात ईशान या वायव्य दिशा में रखें।
* पश्चिम-दक्षिण, उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम दिशाओं को अन्य दिशाओं के मुकाबले ज्यादा से ज्यादा ढंका व भरा हुआ होना चाहिए तथा थोड़ा ऊंचा भी होना चाहिए।
                                                सरल वास्तु टिप्स 3 : क्या करें, क्या न करें

- खूंखार जानवर के चित्र न लगाएं
भवन निर्माण या वास्तु दोषों से मुक्ति हेतु कुछ वैज्ञानिक प्रयासों को अंजाम देकर परिवार में सुख, शांति और व्यापारिक संस्थानों को श्रीसमृद्धि से युक्त बनाया जा सकता है।
वास्तु टिप्स का लाभ उठा कर अपने बौद्धिक साहस का परिचय दीजिए। चमत्कारों का सूर्य आपको आभायुक्त बना देगा।
* घर में कांटेदार पौधे, युद्ध के दृश्य, सूखे पेड़, जमीन, आंसू बहाते प्राणी, खूंखार जानवर आदि के चित्र न लगाएं।
* बच्चों के कमरों में सुंदर प्राकृतिक दृश्य यथा समृद्ध हरे-भरे पहाड़, जल विहार तथा महापुरुषों के चित्र लगाएं। नाइट लैम्प के रूप में हरे या नीले बल्ब का प्रयोग सुखद रहेगा।
* उत्तम भाग्य तथा पारिवारिक समृद्धि के लिए सुंदर रंगीन पर्दे, दीवार व छतों पर हल्के और मन लुभावने रंगों का प्रयोग करें।
* कॉर्नर, बीम आदि की नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए पेड़-पौधों, सीनरी व लाइट्स का प्रयोग पारिवारिक सुख-सौहार्द के लिए अनुकूलता प्रदान करेगा।
* टॉयलेट में सीट पूर्व-‍पश्चिम दिशा की ओर कदापि नहीं होना चाहिए।
* व्यावसायिक कार्यालयों में दक्षिण दिशा में संस्थान के मालिक की फोटो लगाएं।
* पवन घंटियां घर में सौभाग्य बढ़ाने का अद्भुत स्रोत हैं। पवन घंटियां बैठक तथा घर में स्थापित मंदिर के दरवाजे पर लटकाने से शुभ्रता प्रदान करती है।
* मधुर संबंधों के लिए प्रसन्नचित मुद्रा में संयुक्त परिवार का फोटो लगाएं।
* घर में नमक मिले पानी से पोंछा लगाएं। यह घर में स्‍थित नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होगा।
                                                  जानिए कौन-सी दिशा किसके लिए है शुभ

वास्तु के सिद्धांत आयु एवं समृद्धि के लिए शुभ फलदायी
संपूर्ण धरती पर वास्तु के सिद्धांत काम करते हैं। इसकी वजह है कि प्रत्येक दिशा अथवा पदार्थ किसी न किसी ग्रह द्वारा प्रभावित होते हैं।
इसी कारण किसी भी व्यवसाय या कार्य को यदि दिशाओं एवं ग्रहों के अनुकूल संबंध रहने पर ही लाभ होता है।
वास्तु के सिद्धांत आयु एवं समृद्धि के लिए शुभ फलदायी
पूर्व दिशा : ग्रहों में सूर्य पूर्व दिशा का स्वामी होता है। दवा, औषधि संबंधी व्यवसाय अथवा पेशे के लिए पूर्व की दिशा सबसे उपयुक्त है। यदि दवाई की दुकान है तो सामग्री उत्तर एवं पूर्व के रैक पर रखें। इसका कारण है कि उत्तर-पूर्व के निकट सूर्य की जीवनदायिनी किरणें सर्वप्रथम पड़ती हैं, जो कि दवाइयों को ऊर्जापूर्ण बनाए रखती है जिसके सेवन से मनुष्य शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है।
आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा का संबंध सूर्य ग्रह से है अतः इसे पूर्व दिशा की रैक पर रखना लाभप्रद होता है।
 उत्तर-पूर्व के भूखंड पर ऊनी वस्त्र, अनाज की आढ़त, आटा पीसने की चक्की तथा आटा मिलों का कार्य काफी लाभप्रद होता है।
उत्तर-पूर्व दिशा : उत्तर-पूर्व दिशा का ग्रह स्वामी गुरु है, जो कि आध्यात्मिक एवं सात्विक विचारों के प्रणेता हैं। उत्तर-पूर्व दिशा अभिमुख भूखंड शिक्षक, प्राध्यापक, धर्मोपदेशक, पुजारी, धर्मप्रमुख, प्राच्य एवं गुप्त विद्याओं के जानकार, न्यायाधीश, वकील, शासन से संबंधित कार्य करने वाले, बैंकिंग व्यवस्था से संबंधित कार्य, धार्मिक संस्थान, ज्योतिष से संबंधित कार्यों के लिए लाभप्रद होता है।
छपाई के कार्य के लिए यह दिशा विशेष लाभकारी होती है। बिजली उपकरणों की दुकान/ कारखाना लगाना भी लाभप्रद होता है।
ध्यान रहे कि किसी भी भवन में कृत्रिम जलाशय एवं फव्वारों को व्यवस्थित तरह से लगाना चाहिए। जल को धन-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। धनागमन के प्रतीक फव्वारों एवं जलाशयों को ठीक तरह से लगाना चाहिए, क्योंकि यदि पानी का निकास गलत ढंग से हो तो धन-संपत्ति चली जाती है।
किसी भी भवन की दक्षिण-पश्चिम दिशा में भारी पत्थर एवं मूर्तियां लगाने से पति-पत्नी के अलगाव, निरंतर यात्राओं एवं अस्थायित्व का दोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
कहां रखें घर में कछुए की मूर्ति : जीवित कछुआ पालने या कछुए की मूर्ति या फोटो अपने घर की उत्तर दिशा में रखने या लगाने से जीवन में सुख-समृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
कछुए का मुंह पूर्व की तरफ रखना चाहिए। यह आयु को बढ़ाता है। घर की उत्तर दिशा में किसी तालाब या पानी के टब में कछुए का होना पूरे घर वाले की समृद्धि एवं आयु के लिए शुभ फलदायी होता है।
                                                  वास्तु : ऐसे सजाएं घर कि खुशियां स्वागत करें

वास्तु से जानिए घर कैसे सजाएं
घर का वास्तु उत्तम हो तो आपको कोई भी चीज परेशान नहीं कर सकती। इन आसान से वास्तु टिप्स को आजमाकर आप अपनी जिंदगी को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से जी सकते हैं। घर की सजावट ऐसे करें कि खुशियां भी आपका स्वागत मुस्कुरा कर करें।
1. घर के मुख्य द्वार की सजावट करें। ऐसा करने से आपके धन की वृद्धि होती है।
2. घर की खिड़कियों में सुंदर कांच लगाएं, आपके संबंधों में मधुरता आएगी।
3. घर में दर्पण कुछ इस तरह से लटकाएं कि उसमें लॉकर या कैश बॉक्स का प्रतिबिम्ब बने, ऐसा करने से आपकी धन-दौलत और शुभ अवसरों पर दो गुनी वृद्धि होती है।
4. अपने मास्टर बेडरूम को हल्के रंगों से पेंट करना चाहिए, जैसे समुंदरी हरा, हल्का गुलाबी और हल्का नीला- ये वो रंग हैं, जो बेडरूम के लिहाज से अच्छे रहते हैं।
5. घर में रखी बेकार की वस्तुओं को समय-समय पर फेंकते रहना चाहिए, क्योंकि वास्तु के अनुसार घर में पड़ी वस्तुओं से प्रेम में बाधा पहुंचती है।
                                       वास्तु टिप्स : कहीं आपके घर में तो नहीं है द्वार दोष

द्वार का किसी भी घर के लिए विशेष महत्व है। हम द्वार को खूब सजा कर भी रखते हैं लेकिन वास्तुशास्त्र कहता है कि इसमें दिशा का खास ध्यान रखा जाना चाहिए। यह हमारे हाथ में नहीं है कि हम द्वार का मनचाहा मुख रखें लेकिन हम यह अवश्य कर सकते हैं कि जिस दिशा में हमारे घर का द्वार है उसके अनुसार वास्तु उपाय आजमा लें।
                                                            पूर्व दिशा का द्वार

वास्तु के अनुसार पूर्व दिशा में घर का दरवाजा हो तो ऐसा व्यक्ति कर्ज में डूब जाता है।
उपाय : इसके लिए सोमवार को रुद्राक्ष घर के दरवाजे के मध्य लटका दें और पहले सोमवार को हवन कर रुद्राक्ष व शिव की आराधना करने से आपके समस्त कार्य सफल होंगे।

शास्त्रों के अनुसार प्रथम पूज्य श्री गणेश को परिवार का देवता माना गया है। परिवार की किसी भी प्रकार की परेशानी के लिए गणेशजी की आराधना श्रेष्ठ उपाय है। वहीं वास्तु में भी श्री गणेश की प्रतिमा को वास्तुदोष दूर करने का अचूक उपाय बताया गया है।

वास्तु के अनुसार घर में विघ्न विनाशक श्री गणेश की प्रतिमा रखना बहुत शुभ माना जाता है। जहां गणेशजी की प्रतिमा रहती है उस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का वास्तुदोष सक्रीय नहीं हो पाता। साथ ही घर के आसपास भी नकारात्मक ऊर्जा भी प्रभाव नहीं दिखा पाती। इनकी प्रतिमा के शुभ प्रभाव से परिवार के सभी सदस्यों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

घर में श्रीगणेश की प्रतिमा कहां रखनी चाहिए? इस संबंध में वास्तु के अनुसार इनकी मूर्ति ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में लगानी चाहिए। नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में श्रीगणेश की मूर्ति शुभ प्रभाव नहीं देती।

घर के पूजन स्थल पर गणेशजी की बाएं हाथ की ओर सूंड वाली मूर्ति बहुत शुभ मानी जाती है। घर में जहां वास्तु दोष हो वहां सिंदूर से स्वस्तिक का चिन्ह बनाएं। साथ घर के मुख्य द्वार गणेशजी की प्रतिमा या उनका प्रतिक चिन्ह स्वस्तिक बनाएं।

घर की सजावट बढ़ाने के लिए दीवारों पर फोटो लगाए जाते हैं। इनसे घर की सुंदरता तो बढ़ती है साथ ही मन को सुकून भी मिलता है लेकिन दीवारों पर कैसे फोटो लगाए जाने चाहिए? इस संबंध में वास्तु में कई आवश्यक बिंदू बताए गए हैं।

बेडरूम में सिर्फ राधा-कृष्ण की फोटो लगाएं

वास्तु के अनुसार पति-पत्नी का बेडरूम घर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यहां किसी भी भगवान का फोटो लगाना अशुभ माना जाता है। पति-पत्नी के बेडरूम में सिर्फ राधा और श्रीकृष्ण का प्रेम दर्शाता हुआ फोटो लगाया जा सकता है।

बेडरूम में देवी-देवताओं के फोटो या तस्वीर लगाना वास्तु में मना किया गया है। इससे कई प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। पति-पत्नी में सदैव प्रेम बना रहे इसके लिए बेडरूम की दीवार पर राधाकृष्ण का फोटो लगाया जा सकता है। राधा और कृष्ण प्रेम के प्रतीक माने जाते हैं।

इन्हें देखने से सभी के मन में नि:स्वार्थ प्रेम बढ़ता है और पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति ज्यादा समर्पित होते हैं। यदि पति-पत्नी के बीच लड़ाई-झगड़े अधिक होते हैं तो उन्हें अपने रूम में राधा और कृष्ण का फोटो लगा लेना चाहिए। इससे झगड़े की संभावनाओं में कमी आएगी और प्रेम बढ़ेगा।

ये सात चीजें रखें घर में, हो जाएगा सब पॉजीटिव

ये सात चीजें इस प्रकार है- मछलियां, दर्पण, क्रिस्टल, घंटी, बांसुरी, कछुआ, सिक्के, लाफिंग बुद्धा आदि घर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाने का कार्य करते हैं। इन्हें वास्तु अनुसार सही स्थानों पर रखने से जहां परिवार के सभी सदस्यों के विचार सकारात्मक बनते हैं वहीं दूसरी ओर पैसों से जुड़ी समस्याएं दूर हो जाती हैं। इन सात चीजों को घर में किस स्थान पर रखना चाहिए इस संबंध में जीवनमंत्र के वास्तु सेगमेंट लेख खोजे जा सकते हैं।
यदि भाग्य रेखा (मिडिल फिंगर से निकलने वाली रेखा) हृदय रेखा से निकलकर सीधे शनि पर्वत तक जाती है और आगे जाकर यह रेखा त्रिशूल बना देती है।

जिसका एक हिस्सा गुरु पर्वत (इंडैक्स फिंगर के नीचे वाला हिस्सा) पर और दूसरा सूर्य पर्वत (रिंग फिंगर के नीचे का क्षेत्र) तक जाता है तो यह अत्यंत शुभ मानी जाती है। यदि इसी प्रकार रेखा आगे जाकर दो भागों में बंट जाती है तो ऐसा व्यक्ति लाखों-करोड़ों रुपए कमाता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में मान, पद, प्रतिष्ठा, धन व सम्मान प्राप्त करता है।


अचूक उपाय: अपनाएं वास्तु के ये 9 नियम,

वास्तु के इन नियमों को अपनाकर घर-परिवार में सुख, शांति और व्यापारिक संस्थानों को श्रीसमृद्धि से युक्त बनाया जा सकता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार यहां दिए नियकों को अपनाएं और जीवन में सुख ऐश्वर्य का अनुभव करें।

1- स्फटिक के शिवलिंग की पूजा करें। स्फटिक असली हो तो प्रभाव में वृद्धि होगी।

2- भवन निर्माण में दरवाजे और खिड़कियां सम संख्या में हों तथा सीढ़ियां विषम संख्या में हों।

3- टॉयलेट और किचन एक पंक्ति (कतार) में या आमने-सामने होना दोषकारक है।

4- घर में गणेशजी की एक से अधिक मूर्ति हो तो कोई बुराई नहीं है, लेकिन पूजा एक ही गणेशजी की करनी चाहिए।

  5- घर के बाहर या अंदर आशीर्वाद मुद्रा में देवी-देवता की मूर्ति अथवा चित्र लगाते हैं तो ध्यान रहे कि उनका मुंह भवन के बाहर की तरफ हो। सिर्फ गणेश का मुंह भवन के भीतर होना चाहिए क्योंकि गणेश के पीछे दरिद्रता रहती है।

6- घर के ड्राइंगरूम में मोर, बंदर, शेर, गाय, मृग आदि के चि‍त्र या मूर्ति रूप में किसी एक का जोड़ा रखें। इनका मुंह एक-दूसरे की तरफ हो तथा मुंह घर के अंदर हो, शुभ रहेगा।

7- बीम के नीचे बिंदु चिप्स लगाकर बीम के दोष को दूर कर सकते हैं।

8- श्रीयंत्र को केवल पूजा घर में ही रखना चाहिए।

9- संपत्ति तथा सफलता के लिए अपने बैठक कक्ष में पिरामिड को उत्तर-पूर्व में रखें।
 



वास्तुशास्त्र

   अचूक उपाय : अपनाएं वास्तु के ये 9 नियम , वास्तु के इन नियमों को अपनाकर घर-परिवार में सुख, शांति और व्यापारिक संस्थानो...